रथयात्रा: गजपति महाराज की 'छेरा पहरा' और पहंडी बीजे के रहस्य

ओडिशा के पवित्र धाम श्रीक्षेत्र पुरी में आयोजित होने वाली महाप्रभु श्रीजगन्नाथ जी की रथयात्रा या स्नानयात्रा जैसी प्रत्येक नीति-नियंत्रण और परंपरा के पीछे एक गहरा आध्यात्मिक व सांस्कृतिक रहस्य छिपा होता है।

जब करोड़ों श्रद्धालु रथयात्रा के दौरान भगवान की पहंडी बीजे और गजपति महाराज की 'छेरा पहरा' (सोने की झाड़ू से रथ की सफाई) सेवा देखते हैं, तो उनके मन में एक विशेष प्रश्न अवश्य उठता है: पहांडी के समय प्रत्येक विग्रह के साथ एक-एक छत्र और आलट होता है, लेकिन गजपति महाराज की तामजान (पालकी) सवारी के दौरान एक से अधिक छत्र और आलट क्यों लाए जाते हैं?

यह प्रश्न जगन्नाथ संस्कृति की इस अलौकिक परंपरा के पीछे के गूढ़ रहस्यों को समझने की जिज्ञासा जगाता है।गजपति महाराज: 'चलंती विष्णु' का दिव्य सम्मानश्रीमंदिर की सदियों पुरानी परंपरा में, पुरी के गजपति महाराज को केवल एक राजा नहीं, बल्कि महाप्रभु श्रीजगन्नाथ जी के प्रथम सेवक यानी 'आद्य सेवक' के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।

उन्हें जगन्नाथ संस्कृति में 'चलंती विष्णु' (चलते-फिरते भगवान विष्णु का प्रतीक) मानकर पूजा जाता है।

रथयात्रा: गजपति महाराज की 'छेरा पहरा' और पहंडी बीजे के रहस्य

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