भारतीय शहरों से क्यों गायब हो रही हैं गौरैया? एक गहराता मूक संकट

कभी भारतीय घरों और मोहल्लों की सुबह गौरैया की चहचहाहट से शुरू होती थी।

वे खिड़कियों की जाली पर बैठतीं, खपरैल की छतों के नीचे घोंसले बनातीं, आंगन में कुछ चावल के दानों की तलाश में फुदकतीं, और अनाज के खुले बोरों के पास बाजारों में झुंड में इकट्ठा होती थीं।

लेकिन पिछले कुछ दशकों में, खासकर 1980 और 1990 के दशक के बाद, भारत के तेजी से विकसित हो रहे शहरी क्षेत्रों से यह परिचित दृश्य धीरे-धीरे गायब हो गया है।

भारतीय शहरों से गौरैया का यह मूक पलायन शहरीकरण, कंक्रीट के जंगलों के विस्तार, प्राकृतिक आवासों के विनाश और बदलती जीवनशैली का सीधा परिणाम है, जिससे इन नन्हीं चिड़ियों के अस्तित्व पर गहरा संकट मंडरा रहा है।एक मधुर अतीत और खामोश वर्तमानगौरैया की उपस्थिति इतनी सामान्य थी कि लोग शायद ही कभी उन पर ध्यान देते थे।

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