हाल ही में, देश की सर्वोच्च अदालत, सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण सुनवाई हुई, जिसने देश के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में जवाबदेही और जन सुरक्षा के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पांचोली की पीठ ने 19 मई 2026 को उस याचिका पर विचार किया, जो वर्ष 2025 में लागू हुए 'सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया' जिसे 'शांति एक्ट' के नाम से जाना जाता है, को चुनौती देती है।
इस कानून के तहत किसी भी परमाणु दुर्घटना की स्थिति में मुआवजे की अधिकतम सीमा 3,000 करोड़ रुपये तय की गई है।
याचिकाकर्ता इस सीमा को अस्वीकार्य मानते हुए असीमित जवाबदेही की मांग कर रहे हैं, उनका तर्क है कि परमाणु आपदाओं का पैमाना इतना व्यापक हो सकता है कि यह निर्धारित सीमा अपर्याप्त साबित होगी और पीड़ितों को न्याय नहीं मिलेगा।