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परमाणु दुर्घटना मुआवजा: 'शांति एक्ट' पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, जवाबदेही पर बहस तेज

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परमाणु दुर्घटना मुआवजा: 'शांति एक्ट' पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, जवाबदेही पर बहस तेज
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हाल ही में, देश की सर्वोच्च अदालत, सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण सुनवाई हुई, जिसने देश के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में जवाबदेही और जन सुरक्षा के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पांचोली की पीठ ने 19 मई 2026 को उस याचिका पर विचार किया, जो वर्ष 2025 में लागू हुए 'सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया' जिसे 'शांति एक्ट' के नाम से जाना जाता है, को चुनौती देती है। इस कानून के तहत किसी भी परमाणु दुर्घटना की स्थिति में मुआवजे की अधिकतम सीमा 3,000 करोड़ रुपये तय की गई है। याचिकाकर्ता इस सीमा को अस्वीकार्य मानते हुए असीमित जवाबदेही की मांग कर रहे हैं, उनका तर्क है कि परमाणु आपदाओं का पैमाना इतना व्यापक हो सकता है कि यह निर्धारित सीमा अपर्याप्त साबित होगी और पीड़ितों को न्याय नहीं मिलेगा। यह मामला औद्योगिक विकास और नागरिकों की सुरक्षा के बीच संतुलन साधने की एक जटिल कानूनी और नैतिक लड़ाई बन गया है, जिसकी अगली सुनवाई जुलाई में होगी।

'शांति एक्ट' और उसकी चुनौतियां

'शांति एक्ट, 2025' भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए एक महत्वपूर्ण विधायी कदम है, जिसका उद्देश्य परमाणु ऊर्जा के स्थिर दोहन और संवर्धन के माध्यम से देश के परिवर्तन को गति देना है। हालांकि, इस एक्ट का सबसे विवादास्पद प्रावधान परमाणु दुर्घटनाओं के लिए मुआवजे की अधिकतम सीमा को 3,000 करोड़ रुपये तक सीमित करना है। याचिकाकर्ताओं ने इस प्रावधान को सीधे तौर पर चुनौती दी है, यह तर्क देते हुए कि दुनिया भर में हुई बड़ी परमाणु दुर्घटनाओं, जैसे चेरनोबिल या फुकुशिमा, ने दिखाया है कि उनके मानवीय और पर्यावरणीय प्रभाव दशकों तक बने रहते हैं और उनकी लागत निर्धारित सीमा से कहीं अधिक हो सकती है। उनका मानना है कि यह सीमा परमाणु संयंत्रों के संचालकों को उनकी पूर्ण जवाबदेही से मुक्त करती है और संभावित लापरवाही के लिए प्रोत्साहन भी दे सकती है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस मामले की संवेदनशीलता को स्वीकार करते हुए इसे एक "बेहद संवेदनशील विधायी नीतिगत मुद्दा" करार दिया। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि यह याचिका सीधे तौर पर देश की आर्थिक नीति से जुड़ी हुई है, जो यह दर्शाता है कि अदालत इस कानून के व्यापक आर्थिक प्रभावों को भी ध्यान में रख रही है। यह कानूनी लड़ाई इस मौलिक प्रश्न पर केंद्रित है कि क्या किसी राष्ट्र का आर्थिक विकास उसके नागरिकों की सुरक्षा और कल्याण की कीमत पर होना चाहिए, खासकर ऐसे उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में जैसे कि परमाणु ऊर्जा।

सुरक्षा बनाम आर्थिक विकास: एक जटिल बहस

यह मामला भारत के लिए एक महत्वपूर्ण दुविधा प्रस्तुत करता है: एक तरफ देश की बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए परमाणु ऊर्जा का महत्व है, और दूसरी तरफ किसी भी अप्रत्याशित दुर्घटना की स्थिति में नागरिकों की सुरक्षा और उन्हें पर्याप्त मुआवजा सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संतुलन की नाजुकता को रेखांकित किया है। सरकार और परमाणु ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े हितधारकों का तर्क हो सकता है कि मुआवजे की एक निश्चित सीमा निवेशकों को आकर्षित करने और परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं में निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए आवश्यक है। उनका मानना है कि असीमित जवाबदेही का प्रावधान परमाणु ऊर्जा के विकास को बाधित कर सकता है और देश की ऊर्जा सुरक्षा को खतरे में डाल सकता है। वहीं, याचिकाकर्ता और जन सुरक्षा अधिवक्ता यह तर्क देते हैं कि कोई भी आर्थिक लाभ मानवीय जीवन और दीर्घकालिक पर्यावरणीय क्षति की कीमत पर नहीं आंका जा सकता। वे कहते हैं कि परमाणु दुर्घटनाओं के दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभावों और विस्थापन की लागत को देखते हुए, 3,000 करोड़ रुपये की सीमा एक मजाक से कम नहीं होगी और पीड़ितों को उनके जीवन भर की पीड़ा के लिए पर्याप्त राहत प्रदान करने में विफल रहेगी। यह बहस भारत के भविष्य के ऊर्जा मिश्रण और विकास मॉडल की दिशा को परिभाषित करेगी।

अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य और भविष्य की राह

दुनिया भर में परमाणु ऊर्जा को लेकर विभिन्न देशों में अलग-अलग जवाबदेही कानून हैं। कुछ विकसित देशों में, परमाणु संचालकों पर असीमित जवाबदेही का प्रावधान है, जबकि अन्य में, एक निश्चित सीमा तय की गई है, जिसे सरकार द्वारा अतिरिक्त सहायता से पूरक किया जाता है। भारत का 'शांति एक्ट, 2025' एक मिश्रित दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जहां एक सीमा तय की गई है, लेकिन इसकी पर्याप्तता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट की आगामी जुलाई में होने वाली सुनवाई इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित होगी। यह सुनवाई केवल मुआवजे की सीमा तय करने तक ही सीमित नहीं होगी, बल्कि यह भारत में परमाणु ऊर्जा के विकास की गति, विदेशी निवेश के लिए नियामक वातावरण और सबसे महत्वपूर्ण, देश के नागरिकों के लिए सुरक्षा मानकों को भी प्रभावित करेगी। न्यायालय को एक ऐसा निर्णय देना होगा जो न केवल कानूनी रूप से सुदृढ़ हो, बल्कि नैतिक रूप से भी स्वीकार्य हो और देश के दीर्घकालिक हितों की रक्षा करे। इस निर्णय का असर न केवल परमाणु ऊर्जा क्षेत्र पर पड़ेगा, बल्कि यह भविष्य में अन्य उच्च जोखिम वाले उद्योगों के लिए भी एक मिसाल कायम करेगा। यह देखना बाकी है कि सुप्रीम कोर्ट किस प्रकार इस जटिल नीतिगत और संवैधानिक मुद्दे पर संतुलन साधता है और भारत के परमाणु भविष्य के लिए क्या रास्ता तय करता है।

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