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धान खरीदी में देरी: किसानों के 'तिहार' पर संकट, सरकार कब जागेगी?

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धान खरीदी में देरी: किसानों के 'तिहार' पर संकट, सरकार कब जागेगी?
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देशभर के धान उत्पादक किसान इन दिनों एक गंभीर वित्तीय संकट का सामना कर रहे हैं, क्योंकि राज्य सरकारों द्वारा धान की सरकारी खरीद शुरू करने में लगातार देरी हो रही है। विशेषकर छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश जैसे धान बहुल राज्यों में, जहां फसल की कटाई लगभग पूरी हो चुकी है, लाखों किसान अपनी उपज बेचने के लिए सरकारी मंडियों के खुलने का इंतजार कर रहे हैं। यह देरी ऐसे समय में हो रही है जब आगामी त्योहारी सीजन नजदीक है, और किसानों को अपने परिवार की जरूरतों के लिए पैसों की सख्त आवश्यकता है। इस अनिश्चितता के चलते, अन्नदाताओं के मन में यह सवाल गहराता जा रहा है कि सरकार कब उनकी मेहनत का मोल चुकाएगी और उनके लिए 'तिहार' मनाना कैसे संभव होगा।

खरीदी में देरी और किसानों की आर्थिक बदहाली

धान की फसल, जो भारत के ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, किसानों के लिए वर्ष भर की मेहनत का फल होती है। कटाई के बाद अपनी उपज बेचकर किसान न केवल पिछली देनदारियां चुकाते हैं बल्कि अगली फसल की बुवाई और परिवार के भरण-पोषण के लिए पूंजी भी जुटाते हैं। इस वर्ष, कई राज्यों में सरकारी एजेंसियों द्वारा धान खरीदी की प्रक्रिया अभी तक शुरू नहीं की गई है, जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति डांवाडोल हो गई है। उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ में धान की कटाई अक्टूबर के अंत तक पूरी होती है, और किसान नवंबर के पहले सप्ताह से बेचना शुरू कर देते हैं। लेकिन इस साल नवंबर का महीना लगभग बीत चुका है, और खरीद केंद्रों पर सन्नाटा पसरा है।

इस देरी का सीधा असर किसानों की क्रय शक्ति पर पड़ रहा है। खुले बाजार में बिचौलिए कम दामों पर धान खरीदने का फायदा उठा रहे हैं, जिससे किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से काफी कम दाम मिल रहे हैं। यह स्थिति किसानों को अपनी गाढ़ी कमाई का उचित मूल्य मिलने से वंचित कर रही है और उन्हें कर्ज के जाल में धकेलने का खतरा बढ़ा रही है। लाखों क्विंटल धान अब भी किसानों के खलिहानों में पड़ा है, और उन्हें डर है कि मौसम की मार या भंडारण की कमी से उनकी फसल खराब हो सकती है। सरकार की उदासीनता से किसानों में भारी निराशा है।

त्योहारी सीजन पर मंडराता संकट

भारत में त्योहारी सीजन केवल धार्मिक अनुष्ठानों का ही नहीं, बल्कि सामाजिक मेलजोल और आर्थिक गतिविधियों का भी प्रतीक है। दीपावली, छठ पूजा, और स्थानीय पर्व जैसे 'तिहार' (जो छत्तीसगढ़ में दिवाली के बाद मनाया जाता है) किसानों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। इन त्योहारों पर वे अपने घरों की मरम्मत कराते हैं, नए कपड़े खरीदते हैं, पकवान बनाते हैं और परिवार के लिए उपहार लाते हैं। लेकिन इस साल, धान खरीदी में देरी ने इन खुशियों पर ग्रहण लगा दिया है।

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किसानों के हाथ खाली हैं और वे त्योहारों के लिए जरूरी खरीदारी करने में...

किसानों के हाथ खाली हैं और वे त्योहारों के लिए जरूरी खरीदारी करने में असमर्थ महसूस कर रहे हैं। कई किसानों ने बताया कि उनके पास बच्चों के लिए नए कपड़े खरीदने या मिठाइयां बनाने तक के पैसे नहीं हैं। यह स्थिति न केवल उनकी आर्थिक समस्याओं को बढ़ा रही है, बल्कि उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल रही है। एक किसान रामचरण साहू ने बताया, "हर साल इस समय तक धान बेचकर पैसे हाथ में आ जाते थे, जिससे दिवाली और तिहार अच्छे से मना पाते थे। इस बार तो लग रहा है कि त्योहार बिना पैसों के ही गुजर जाएगा।" यह केवल रामचरण की कहानी नहीं, बल्कि देश के लाखों किसानों की साझा व्यथा है।

सरकार की चुप्पी और किसानों की मांग

किसानों की इस विकट स्थिति के बावजूद, राज्य सरकारों की ओर से धान खरीदी शुरू करने की स्पष्ट घोषणा में देरी हो रही है। कई राज्यों में अभी तक खरीदी की तारीखों की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, और जहां घोषणा हुई भी है, वहां प्रक्रिया धीमी है। किसान संगठन लगातार सरकारों से जल्द से जल्द खरीद प्रक्रिया शुरू करने और भुगतान सुनिश्चित करने की मांग कर रहे हैं। वे यह भी मांग कर रहे हैं कि खरीदी केंद्रों पर पर्याप्त व्यवस्था की जाए, ताकि किसानों को अपनी उपज बेचने में किसी प्रकार की परेशानी न हो।

सरकार को इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने की आवश्यकता है। धान खरीदी में देरी से न केवल किसानों को नुकसान हो रहा है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द ही खरीद शुरू नहीं की गई, तो ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक मंदी और गहरा सकती है। किसानों की मांग है कि सरकार न केवल खरीदी की तारीखें घोषित करे, बल्कि प्रक्रिया को सुचारू और पारदर्शी बनाए, ताकि उन्हें अपनी मेहनत का पूरा और समय पर दाम मिल सके। यह सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है कि अन्नदाता त्योहारों के इस मौसम में खाली हाथ न रहें और उनके 'तिहार' में खुशियों की रौनक बरकरार रहे।

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लेखक
Dipti Das
दिप्ति दास साकार भारत की रिपोर्टर हैं। वे छत्तीसगढ़ और देश की ताज़ा खबरें, राजनीति, समाज और जनहित के विषयों पर रिपोर्ट करती हैं।

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