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छत्तीसगढ़: राख मिश्रित पानी से खेतों को नुकसान, किसानों की घटती पैदावार

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छत्तीसगढ़: राख मिश्रित पानी से खेतों को नुकसान, किसानों की घटती पैदावार
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छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के कई गाँवों में किसानों को इन दिनों एक गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा है। थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाला राख मिश्रित पानी उनके कृषि खेतों तक पहुँच रहा है, जिससे उनकी फसलों की पैदावार में लगातार कमी आ रही है और उनके सामने आर्थिक संकट गहरा गया है। यह समस्या पिछले कई महीनों से बनी हुई है, लेकिन हाल ही में धान की कटाई के बाद यह और भी स्पष्ट हो गई है जब किसानों ने अपनी उम्मीद से बहुत कम उपज देखी। किसानों का कहना है कि यह स्थिति आसपास के बिजली संयंत्रों द्वारा राख के निपटान में बरती जा रही लापरवाही का सीधा परिणाम है, जिससे उनकी आजीविका और क्षेत्र का पर्यावरण दोनों प्रभावित हो रहे हैं।

राख मिश्रित पानी का कहर और किसानों की व्यथा

कोरबा के पाली और कटघोरा ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले करीब एक दर्जन गाँवों के किसान इस समस्या से सर्वाधिक प्रभावित हैं। इन गाँवों में मुख्य रूप से धान की खेती की जाती है, जो इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। किसानों का आरोप है कि निकटवर्ती ताप विद्युत संयंत्रों से निकलने वाली राख, जिसे राखड़ बांधों में जमा किया जाता है, वह बरसात में या बांधों के ओवरफ्लो होने पर नहरों और नालों से उनके खेतों तक पहुँच जाती है। पिछले साल की तुलना में इस बार पैदावार में 30 से 50 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। किसान रामलाल साहू बताते हैं, "पहले जहाँ एक एकड़ खेत से 20-25 क्विंटल धान निकलता था, वहीं अब मुश्किल से 10-12 क्विंटल ही मिल पा रहा है। राख मिट्टी में मिलकर उसकी उर्वरता को खत्म कर रही है।" यह स्थिति उनके लिए दोहरी मार है, क्योंकि एक तरफ उनकी आय कम हो रही है और दूसरी तरफ मिट्टी की गुणवत्ता भी लगातार खराब हो रही है।

पर्यावरणीय प्रभाव और दीर्घकालिक कृषि चुनौतियाँ

राख मिश्रित पानी का खेतों में पहुँचना केवल तात्कालिक फसल नुकसान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी पर्यावरणीय और कृषि संबंधी दुष्परिणाम भी सामने आ रहे हैं। थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाली राख, जिसे फ्लाई ऐश भी कहा जाता है, में सिलिका, एल्युमिनियम ऑक्साइड, आयरन ऑक्साइड और कैल्शियम ऑक्साइड जैसे कई तत्व होते हैं। इसके अतिरिक्त, इसमें आर्सेनिक, लेड, मरकरी जैसे कई हानिकारक भारी धातु भी मौजूद होते हैं, जो मिट्टी और पानी दोनों के लिए अत्यंत हानिकारक हैं। यह मिट्टी में मिलकर उसकी भौतिक व रासायनिक संरचना को बदल देती है। मिट्टी की जल धारण क्षमता कम हो जाती है, पीएच स्तर असंतुलित हो जाता है, और आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता प्रभावित होती है। इससे पौधों की जड़ों का विकास रुक जाता है, पोषक तत्वों का अवशोषण प्रभावित होता है, जिससे फसलों की गुणवत्ता और मात्रा दोनों में गिरावट आती है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस समस्या का तुरंत समाधान नहीं किया गया, तो इन क्षेत्रों की कृषि भूमि बंजर होने की कगार पर पहुँच सकती है, जिससे खाद्य सुरक्षा पर भी असर पड़ेगा।

प्रशासनिक उदासीनता और मुआवजे की मांग

कई बार किसानों ने स्थानीय प्रशासन और पावर प्लांट प्रबंधन से शिकायत की है। अधिकारियों से मुलाकात कर ज्ञापन भी सौंपे हैं, पर सुनवाई नहीं हुई। किसानों को केवल आश्वासन मिले हैं, ठोस कार्रवाई नहीं। ग्राम पंचायत सरपंच सुनील पटेल ने बताया, "हमने जिला कलेक्टर और पर्यावरण विभाग को पत्र लिखा है, लेकिन अभी तक कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया है। किसानों को अपनी रोजी-रोटी का संकट झेलना पड़ रहा है और उनके पास मुआवजे के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है।" किसान संगठनों ने भी सरकार से मांग की है कि प्रभावित किसानों को उनकी फसल के नुकसान का उचित मुआवजा दिया जाए और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस उपाय किए जाएं। उनकी प्रमुख मांगों में राखड़ बांधों के उचित रखरखाव, राख के सुरक्षित निपटान के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग और पर्यावरण नियमों का कड़ाई से पालन शामिल है।

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भविष्य की राह और स्थायी समाधान की आवश्यकता

इस समस्या का स्थायी समाधान केवल किसानों की तात्कालिक राहत से कहीं बढ़कर है। संयंत्रों को राख निपटान नीतियों पर गंभीरता से विचार करना होगा। पर्यावरणविदों का सुझाव है कि राख को सीमेंट उद्योग, ईंट या सड़क निर्माण में उपयोग किया जाए, जिससे यह अपशिष्ट एक संसाधन बन सके। राखड़ बांधों का उचित रखरखाव महत्वपूर्ण है ताकि वे ओवरफ्लो होकर खेतों तक दूषित पानी न पहुँचाएँ। सरकार को पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत संयंत्रों पर कड़ी निगरानी रखनी चाहिए और उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। यह न केवल किसानों की आजीविका की रक्षा करेगा बल्कि छत्तीसगढ़ के कृषि-प्रधान क्षेत्रों के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में भी मदद करेगा। किसानों का संघर्ष इस बात का प्रमाण है कि विकास परियोजनाओं को पर्यावरण और स्थानीय समुदायों की कीमत पर लागू नहीं किया जा सकता।

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लेखक
Dipti Das
दिप्ति दास साकार भारत की रिपोर्टर हैं। वे छत्तीसगढ़ और देश की ताज़ा खबरें, राजनीति, समाज और जनहित के विषयों पर रिपोर्ट करती हैं।

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