बस्तर दशहरा: सांसद महेश कश्यप ने विजय रथ निर्माण में किया श्रमदान
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छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल बस्तर अंचल में विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की भव्य तैयारियां मध्य अक्टूबर 2026 से ही जोर-शोर से शुरू हो गई हैं। इसी कड़ी में, जगदलपुर स्थित ऐतिहासिक सिरहासार भवन के समक्ष बनने वाले 8 चक्कों वाले विजय रथ के निर्माण कार्य में बस्तर के सांसद और दशहरा समिति के अध्यक्ष, महेश कश्यप ने स्वयं श्रमदान किया। उन्होंने झाड़ उमरगां और बेड़ा उमरगांव से आए150 से अधिक पारंपरिक कारीगरों के साथ मिलकर देवी की सेवा के इस पवित्र कार्य में अपना योगदान दिया, जिससे न केवल कारीगरों का उत्साह बढ़ा, बल्कि बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के प्रति जनभागीदारी का संदेश भी प्रसारित हुआ। यह श्रमदान बस्तर दशहरा की अद्वितीय परंपराओं और सामुदायिक भावना को दर्शाता है, जहाँ हर वर्ग के लोग इस 75 दिवसीय महापर्व को सफल बनाने में अपनी भूमिका निभाते हैं।
बस्तर दशहरा: एक अद्वितीय सांस्कृतिक महापर्व
बस्तर दशहरा, जिसे विश्व के सबसे लंबे दशहरे के रूप में जाना जाता है, केवल दस दिनों का त्योहार नहीं, बल्कि लगभग 75 दिनों तक चलने वाला एक अनूठा और विस्तृत अनुष्ठान है। यह पर्व 15वीं शताब्दी से भी पुराना माना जाता है और इसमें रावण दहन की बजाय माँ दंतेश्वरी और अन्य स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना पर विशेष जोर दिया जाता है। इस दौरान पाट जात्रा, काछिन गादी, कलश स्थापना, जोगी बिठाई, मावली परघाव, भीतर रैनी, बाहर रैनी, मुरिया दरबार और ओहाड़ी जैसे कई पारंपरिक अनुष्ठान होते हैं। इन अनुष्ठानों का अपना एक गहरा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व है, जो बस्तर की आदिवासी संस्कृति और स्थानीय परंपराओं को जीवंत रखते हैं। रथ निर्माण इन तैयारियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो सदियों पुरानी शिल्प कला और आस्था का प्रतीक है। यह पर्व बस्तर के विभिन्न आदिवासी समुदायों को एक साथ लाता है, जिससे सामाजिक समरसता मजबूत होती है। यह स्थानीय लोगों के लिए केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि उनकी पहचान, आस्था और जीवनशैली का अभिन्न अंग है।
सांसद महेश कश्यप का श्रमदान और जनभागीदारी का संदेश
बस्तर के सांसद और दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप ने जिस प्रकार स्वयं फावड़ा उठाकर रथ निर्माण कार्य में श्रमदान किया, वह जनप्रतिनिधियों के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत करता है। कश्यप ने इस अवसर पर कहा कि बस्तर के आदिवासी और अन्य जातियों के लोग अपनी-अपनी क्षमतानुसार देवी की सेवा में अपना योगदान देते हैं, और इसी भावना से प्रेरित होकर उन्होंने भी श्रमदान किया है। उनका यह कार्य केवल शारीरिक श्रम नहीं, बल्कि बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक मूल्यों के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह दर्शाता है कि यह पर्व केवल प्रशासन या समिति का नहीं, बल्कि संपूर्ण बस्तर अंचल के लोगों का है। सांसद का यह कदम कारीगरों के मनोबल को बढ़ाने के साथ-साथ आम जनता को भी इस भव्य आयोजन में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रेरित करेगा। यह सार्वजनिक सहभागिता ही है जो बस्तर दशहरा को इतना खास और जीवंत बनाती है।
विजय रथ: आस्था, शिल्प और परंपरा का संगम
इस वर्ष बस्तर दशहरा के लिए विशेष रूप से 8 चक्कों वाले "विजय रथ" का निर्माण किया जा रहा है। यह रथ केवल एक वाहन नहीं, बल्कि माँ दंतेश्वरी की विजय और बस्तर की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। जगदलपुर के सिरहासार भवन के सामने झाड़ उमरगां और बेड़ा उमरगांव के150 से अधिक कुशल कारीगर, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘रथकार’ कहा जाता है, पूरी श्रद्धा और लगन से इस भव्य रथ को आकार दे रहे हैं। ये कारीगर पीढ़ियों से चली आ रही अपनी पारंपरिक शिल्प कला का उपयोग करते हुए, स्थानीय सागौन और अन्य विशेष लकड़ियों से रथ का निर्माण करते हैं। रथ के हर हिस्से को बारीक नक्काशी और पारंपरिक रूपांकनों से सजाया जाता है, जो बस्तर की आदिवासी कला की विशिष्टता को दर्शाता है। रथ निर्माण की प्रक्रिया भी कई धार्मिक अनुष्ठानों और परंपराओं से बंधी होती है, जिसमें शुभ मुहूर्त का चयन और विशेष पूजा-अर्चना शामिल है। यह रथ बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर और सामुदायिक सहयोग का एक जीवंत उदाहरण है। व व