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वीर सावरकर जयंती पर युवा दल ने किया नमन, संघर्ष और देशभक्ति को किया याद

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वीर सावरकर जयंती पर युवा दल ने किया नमन, संघर्ष और देशभक्ति को किया याद
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हरियाणा के रेवाड़ी में 28 मई 2026 को वीर सावरकर की जयंती के अवसर पर वीर भगतसिंह युवा दल द्वारा एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य महान स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर के देशप्रेम, उनके संघर्षपूर्ण जीवन और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनके अमूल्य योगदान को याद करना था। आयोजकों और उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों ने सावरकर के बलिदान और उनकी राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रेरणा लेने का आह्वान किया, जिससे युवा पीढ़ी देश के प्रति अपने कर्तव्यों को समझ सके और एकजुटता की भावना को मजबूत कर सके। कार्यक्रम में राष्ट्रीय व्यापार सेवा संघ के जिला प्रधान दीपेश भार्गव और युवा दल के प्रधान दिनेश कपूर सहित कई प्रमुख हस्तियां मौजूद रहीं, जिन्होंने सावरकर के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला।

प्रारंभिक जीवन और क्रांतिकारी चेतना

वीर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के भागूर गांव में हुआ था। उनके बचपन से ही देशभक्ति की भावना उनके भीतर कूट-कूट कर भरी थी। युवावस्था से ही उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष का मार्ग चुना और अपने विचारों से कई लोगों को प्रभावित किया1905 में उन्होंने ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार करते हुए उनकी होली जलाने का कार्यक्रम शुरू किया, जो उस समय देशवासियों को अंग्रेजों के विरुद्ध एकजुट करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास था। इस क्रांतिकारी कृत्य के परिणामस्वरूप उन्हें फर्ग्यूसन कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया था। सावरकर ने न केवल विरोध प्रदर्शनों में भाग लिया, बल्कि अपनी लेखनी के माध्यम से भी क्रांति की अलख जगाई। 1909 में उन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम पर एक पुस्तक लिखी, जिसने देशवासियों में क्रांति की ज्वाला भर दी और उन्हें अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया। यह पुस्तक ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबंधित कर दी गई थी, लेकिन इसने गुप्त रूप से राष्ट्रीय चेतना को जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई

काला पानी की यातना और अदम्य साहस

सावरकर के क्रांतिकारी विचारों और गतिविधियों के कारण ब्रिटिश सरकार उन्हें अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानती थी। 1911 में उन्हें राजद्रोह और हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया और इतिहास की सबसे कठोर सजा, दो बार के आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। उन्हें अंडमान की कुख्यात काला पानी जेल में भेजा गया, जहाँ उन्हें एक सात फुट की कोठरी में रखा गया। यह कोठरी अत्यंत छोटी और अमानवीय परिस्थितियों वाली थी, जहाँ कैदियों को न्यूनतम सुविधाएं भी नहीं मिलती थीं। अंग्रेजों ने उन पर अकल्पनीय जुल्म ढाए; उन्हें कोल्हू में बैल की जगह लगाकर तेल निकालने के लिए मजबूर किया गया। इस अमानवीय व्यवहार का उद्देश्य उनकी आत्मा को तोड़ना था, लेकिन सावरकर ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और राष्ट्रप्रेम की भावना को कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया। उन्होंने जेल के भीतर भी कविताएं लिखीं और अपने विचारों को दीवारों पर उकेरा, जो उनके अदम्य साहस और वैचारिक दृढ़ता का प्रतीक था। उनकी यह यातनापूर्ण अवधि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में बलिदान और प्रतिरोध के एक प्रतीक के रूप में दर्ज है

राजनीतिक नेतृत्व और वैचारिक विरासत

जेल से रिहा होने के बाद भी सावरकर का संघर्ष जारी रहा। 1935 से 1943 तक उन्होंने हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर रहते हुए देश के हिन्दुओं को एकजुट करने का प्रयास किया। उनका मानना था कि एक मजबूत और संगठित हिंदू समाज ही एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकता है। उन्होंने सामाजिक सुधारों और राष्ट्रीय एकता पर जोर दिया। रेवाड़ी में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि दीपेश भार्गव और युवा दल के प्रधान दिनेश कपूर ने सावरकर के इस योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि सावरकर का महान चरित्र और उनके विचार आज भी समस्त देशवासियों के लिए महान प्रेरणा हैं। उनकी राष्ट्रवादी विचारधारा और स्वतंत्रता के प्रति अटूट निष्ठा ने अनगिनत भारतीयों को प्रभावित किया है। कार्यक्रम में भाजपा मण्डल महामंत्री राजीव आहुजा, राम अग्रवाल, मनोज गुप्ता, हेमन्त ग्रोवर, नवीन भार्गव, अशोक कुमार, सचिन वर्मा, दीपक वर्मा और ताराचंद सहित कई गणमान्य व्यक्तियों ने सहयोग किया। सभी उपस्थित लोगों ने भारत माता की जय और वन्दे मातरम के उद्घोष के साथ वीर सावरकर को श्रद्धांजलि अर्पित की, यह दर्शाता है कि उनके आदर्श आज भी देश के युवाओं में देशभक्ति की भावना को जागृत कर रहे हैं

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