पद्मश्री उषा बारले: आधुनिकता में भी पंडवानी की पहचान, नई पीढ़ी को सिखा रहीं लोककला
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छत्तीसगढ़ की गौरवशाली लोककला पंडवानी को आधुनिकता के तेज प्रवाह में भी अपनी पहचान बनाए रखने में प्रख्यात पंडवानी गायिका पद्मश्री उषा बारले महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। उन्होंने वर्तमान में इस प्राचीन कला के संरक्षण और संवर्धन का बीड़ा उठाया है, विशेषकर नई पीढ़ी के बीच इसे लोकप्रिय बनाने पर उनका जोर है। उषा बारले का मानना है कि इस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को विलुप्त होने से बचाने और इसकी परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए युवाओं को इससे जोड़ना अत्यंत आवश्यक है।
पंडवानी: छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर
पंडवानी, छत्तीसगढ़ की एक अनूठी लोक नाट्य शैली है, जिसमें महाभारत के पांडवों की कहानियों को गायन और अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। यह कला रूप मनोरंजन के साथ-साथ भारतीय संस्कृति और पौराणिक कथाओं का जीवंत प्रतिबिंब है। इसके माध्यम से नैतिकता, धर्म और सामाजिक मूल्यों का संदेश दिया जाता है। पारंपरिक रूप से पंडवानी दो शैलियों में प्रस्तुत होती है
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