नवापारा में लोकआस्था का सैलाब: यादव समाज ने की सहाड़ा देव की पूजा, गौरा-गौरी विसर्जन
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छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के अंतर्गत आने वाले नवापारा में हाल ही में लोकआस्था और सांस्कृतिक परंपराओं का अद्भुत संगम देखने को मिला। दीपावली के बाद आने वाले पारंपरिक पर्व के अवसर पर, यादव समाज द्वारा आराध्य सहाड़ा देव की विशेष पूजा-अर्चना की गई, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़े। इसी कड़ी में, आस्था और भक्ति के साथ गौरा-गौरी की प्रतिमाओं का पवित्र त्रिवेणी संगम में विधि-विधान से विसर्जन किया गया। यह आयोजन क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक एकजुटता को दर्शाता है, जहाँ पीढ़ी दर पीढ़ी लोक परम्पराओं का निर्वहन पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ किया जा रहा है।
नवापारा में लोकआस्था का अद्भुत संगम
नवापारा, जिसे राजिम के समीप होने के कारण 'छत्तीसगढ़ के प्रयाग' के रूप में भी जाना जाता है, में लोकआस्था का रंग इन दिनों अपने चरम पर था। क्षेत्र के ग्रामीण अंचल से लेकर शहरी हिस्सों तक, हर जगह पर्व का उत्साह और भक्ति का माहौल व्याप्त था। यह पर्व न केवल धार्मिक अनुष्ठानों का प्रतीक है, बल्कि यह सामाजिक मेलजोल और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम बनता है। विभिन्न समुदायों के लोग एक साथ आकर इन आयोजनों में भाग लेते हैं, जिससे आपसी भाईचारा और सौहार्द मजबूत होता है। पारंपरिक लोककलाएं और लोकगीत इन आयोजनों की शोभा बढ़ाते हैं, जो स्थानीय निवासियों के लिए आकर्षण का केंद्र बनते हैं। इस वर्ष भी, नवापारा में आयोजित इन धार्मिक कार्यक्रमों में हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, जो उनकी अटूट आस्था का प्रमाण है।
यादव समाज की सहाड़ा देव पूजा: परंपरा और भक्ति
नवापारा में यादव समाज द्वारा की गई सहाड़ा देव की पूजा विशेष आकर्षण का केंद्र रही। सहाड़ा देव को पशुधन और कृषि की समृद्धि का देवता माना जाता है, और उनकी पूजा यादव समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। पारंपरिक वेशभूषा में सजे यादव समाज के सदस्य, हाथों में लाठी लिए और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन पर थिरकते हुए, पूजा स्थल तक पहुँचे। उन्होंने पूरे विधि-विधान से सहाड़ा देव की प्रतिमा स्थापित कर, दूध, दही, घी और विभिन्न प्रकार के अनाजों का भोग लगाया। इस दौरान, लोकगीतों और पारंपरिक मंत्रोच्चार से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। आसपास के गाँवों से आए यादव समाज के लोगों ने इस पूजा में सक्रिय भागीदारी की। यह पूजा न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि यह यादव समाज की पहचान और सांस्कृतिक जड़ों को भी मजबूत करती है।
त्रिवेणी संगम पर गौरा-गौरी विसर्जन की भव्य परंपरा
पर्व के समापन की ओर बढ़ते हुए, नवापारा के पवित्र त्रिवेणी संगम में गौरा-गौरी की प्रतिमाओं का भव्य विसर्जन किया गया। गौरा-गौरी को भगवान शिव और माता पार्वती का स्वरूप माना जाता है, और उनके विवाह का उत्सव दीपावली के बाद मनाया जाता है। विसर्जन से पहले, प्रतिमाओं को रंगारंग झाँकियों और बैंड-बाजे के साथ शहर के प्रमुख मार्गों से निकाला गया। इस दौरान, श्रद्धालु पारंपरिक राउत नाचा और छत्तीसगढ़ी लोकगीतों के साथ चल रहे थे, जिससे पूरे मार्ग में उत्सव का माहौल था। त्रिवेणी संगम, जहाँ महानदी, पैरी और सोंढूर नदियों का मिलन होता है, अपनी पौराणिक और धार्मिक महत्ता के लिए प्रसिद्ध है। यहीं विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद, प्रतिमाओं को जल में प्रवाहित किया गया। यह विसर्जन इस विश्वास के साथ किया जाता है कि देवी-देवता अपने लोक लौटते हैं और अपने भक्तों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण और भावी पीढ़ियों का जुड़ाव
नवापारा में आयोजित ये पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि ये क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षक भी हैं। ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़े रखने और उन्हें अपनी परंपराओं, रीति-रिवाजों तथा लोक कलाओं से परिचित कराने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करते हैं। स्थानीय प्रशासन और सामाजिक संगठनों के सहयोग से आयोजन भव्य रूप लेते हैं, जिससे इनकी प्रासंगिकता बनी रहे। युवा स्वयंसेवकों की सक्रिय भागीदारी यह सुनिश्चित करती है कि ये परंपराएँ भविष्य में भी जीवंत रहें। इन पर्वों के माध्यम से सामाजिक समरसता बढ़ती है और लोग एक-दूसरे के करीब आते हैं। नवापारा का यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि भले ही समय बदल रहा हो, लेकिन लोकआस्था और सांस्कृतिक मूल्य आज भी लोगों के जीवन में गहरी जड़ें जमाए हुए हैं, जो समाज को एक सूत्र में पिरोए रखने का काम करते हैं।
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