विश्व रेबीज दिवस पर इंदौर में निकली जागरूकता रैली, 'शून्य रेबीज' का आह्वान
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विश्व रेबीज दिवस के अवसर पर 28 सितंबर को इंदौर शहर में एक भव्य जागरूकता रैली का आयोजन किया गया। पशु चिकित्सा विभाग, विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों, स्थानीय प्रशासन और शैक्षणिक संस्थानों के सहयोग से निकाली गई इस रैली का मुख्य उद्देश्य आम जनता को रेबीज के घातक परिणामों और इससे बचाव के प्रभावी उपायों के प्रति जागरूक करना था। रैली में शामिल हजारों प्रतिभागियों ने 'एक स्वास्थ्य, सभी के लिए शून्य रेबीज' के वैश्विक संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि रेबीज जैसी जानलेवा बीमारी से किसी की जान न जाए और समाज को इस खतरे से मुक्त किया जा सके।
रेबीज: एक जानलेवा चुनौती और बचाव के उपाय
रेबीज एक वायरल जुनोटिक बीमारी है जो संक्रमित जानवरों (मुख्यतः कुत्तों) के काटने या खरोंचने से मनुष्यों में फैलती है। यह बीमारी केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती है और एक बार लक्षण दिखने शुरू होने पर यह लगभग 100 प्रतिशत घातक होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, हर साल दुनिया भर में लगभग 59,000 लोग रेबीज से मरते हैं, जिनमें से अधिकांश एशिया और अफ्रीका में होते हैं। भारत में भी रेबीज एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बनी हुई है। इस बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका पालतू जानवरों का नियमित टीकाकरण और आवारा कुत्तों की आबादी का वैज्ञानिक प्रबंधन है। यदि किसी व्यक्ति को जानवर काट ले, तो तुरंत घाव को साबुन और पानी से 15 मिनट तक धोना चाहिए और बिना देर किए डॉक्टर से संपर्क कर रेबीज रोधी टीके लगवाने चाहिए। समय पर टीकाकरण ही रेबीज से जीवन बचाने का एकमात्र तरीका है।
जागरूकता रैली का उद्देश्य और जनभागीदारी
इंदौर में आयोजित इस जागरूकता रैली का मुख्य उद्देश्य रेबीज के प्रति समाज में व्याप्त भ्रांतियों को दूर करना और सही जानकारी का प्रसार करना था। रैली की शुरुआत पशु चिकित्सालय परिसर से हुई और यह शहर के प्रमुख मार्गों से होते हुए राजवाड़ा पर समाप्त हुई। रैली में शामिल स्कूली छात्रों, एनसीसी कैडेट्स और स्वयंसेवकों ने रेबीज से बचाव के नारे लिखे पोस्टर और तख्तियां ले रखी थीं, जिन पर "रेबीज मुक्त भारत", "टीकाकरण ही बचाव है" और "अपने पालतू जानवर को टीका लगवाएं" जैसे संदेश लिखे थे। रैली के दौरान, पशु चिकित्सा अधिकारियों ने लोगों को रेबीज के लक्षणों, रोकथाम और प्राथमिक उपचार के बारे में जानकारी देने वाले पर्चे भी वितरित किए। उन्होंने जोर दिया कि रेबीज केवल कुत्तों से नहीं, बल्कि बिल्ली, बंदर, चमगादड़ और अन्य जंगली जानवरों से भी फैल सकता है, इसलिए सभी संदिग्ध काटने की घटनाओं को गंभीरता से लेना चाहिए।
टीकाकरण का महत्व और सरकारी पहल
रेबीज नियंत्रण में टीकाकरण की भूमिका सर्वोपरि है। पशु चिकित्सा विभाग के डॉ. संजय वर्मा ने बताया कि पालतू कुत्तों का नियमित टीकाकरण रेबीज के प्रसार को रोकने की दिशा में पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने यह भी बताया कि विभाग द्वारा समय-समय पर निःशुल्क रेबीज टीकाकरण शिविर आयोजित किए जाते हैं ताकि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोग भी अपने पालतू जानवरों का टीकाकरण करा सकें। इसके अतिरिक्त, सरकार आवारा कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण (ABC – Animal Birth Control & Anti-Rabies Vaccination) कार्यक्रमों के माध्यम से उनकी आबादी को नियंत्रित करने और रेबीज के खतरे को कम करने का प्रयास कर रही है। राष्ट्रीय रेबीज नियंत्रण कार्यक्रम (NRCP) का लक्ष्य वर्ष 2030 तक भारत को रेबीज मुक्त बनाना है, और इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जनभागीदारी अत्यंत आवश्यक है।
भविष्य की रणनीति और सामुदायिक भागीदारी
रेबीज जैसी बीमारियों से निपटने के लिए एक व्यापक रणनीति की आवश्यकता है जिसमें चिकित्सा, पशु चिकित्सा और जन स्वास्थ्य क्षेत्र मिलकर काम करें। इंदौर में आयोजित यह रैली इसी 'एक स्वास्थ्य' दृष्टिकोण का एक उदाहरण थी, जहां मानव और पशु स्वास्थ्य को एक साथ देखा गया। अधिकारियों ने बताया कि भविष्य में भी ऐसे जागरूकता कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित किए जाएंगे। इसके साथ ही, समुदाय स्तर पर रेबीज के खतरों के बारे में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय ग्राम पंचायतों और शहरी निकायों के साथ मिलकर काम करने की योजना है। नागरिकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी – अपने पालतू जानवरों का टीकाकरण कराएं, आवारा जानवरों से दूरी बनाए रखें, और किसी भी जानवर के काटने पर तुरंत चिकित्सा सहायता लें। सामूहिक प्रयासों से ही हम रेबीज मुक्त समाज का सपना साकार कर सकते हैं।