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वायु प्रदूषण से जंग: ₹13 हजार करोड़, 68% सड़क धूल पर खर्च; 2023 में 20 लाख मौतें

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वायु प्रदूषण से जंग: ₹13 हजार करोड़, 68% सड़क धूल पर खर्च; 2023 में 20 लाख मौतें
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भारत में वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है, जिसके तहत विभिन्न राज्यों को ₹13 हजार करोड़ का विशाल फंड आवंटित किया गया है। इस राशि का एक बड़ा हिस्सा, लगभग 68%, सड़क की धूल हटाने और उसके प्रबंधन पर खर्च किया गया है, जो शहरी क्षेत्रों में प्रदूषण के प्रमुख कारणों में से एक है। यह आवंटन और खर्च ऐसे समय में हुआ है जब वायु प्रदूषण के घातक परिणाम लगातार सामने आ रहे हैं, और 2023 में इस अदृश्य दुश्मन के कारण 20 लाख से अधिक लोगों की दुखद मौतें दर्ज की गई हैं। यह आंकड़ा देशव्यापी प्रयासों की गंभीरता को रेखांकित करता है, जिसका उद्देश्य नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा करना, वायु गुणवत्ता में सुधार लाना और प्रदूषण से होने वाले आर्थिक नुकसान को कम करना है।

प्रदूषण से निपटने के लिए आवंटित विशाल राशि

वायु प्रदूषण के खिलाफ जारी इस लड़ाई में, ₹13 हजार करोड़ का यह केंद्रीय आवंटन एक महत्वपूर्ण वित्तीय सहायता है। यह राशि उन शहरों और राज्यों को प्रदान की गई है जो वायु गुणवत्ता सुधार के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के तहत काम कर रहे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस फंड का एक बड़ा हिस्सा, यानी 68%, सीधे सड़क की धूल के नियंत्रण और प्रबंधन पर लगाया गया है। यह दर्शाता है कि नीति-निर्माताओं ने सड़क की धूल को शहरी वायु प्रदूषण का एक प्रमुख स्रोत माना है, जिसके प्रभावी नियंत्रण से वायु गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार संभव है। शेष 32% राशि का उपयोग अन्य प्रदूषणकारी कारकों जैसे औद्योगिक उत्सर्जन को नियंत्रित करने, वाहनों से निकलने वाले धुएं को कम करने के लिए तकनीकी उन्नयन, निर्माण स्थलों पर धूल के फैलाव को रोकने और हरित आवरण बढ़ाने जैसे उपायों पर किया गया है। यह निवेश देश के बड़े शहरों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) को बेहतर बनाने की दिशा में एक ठोस प्रयास का प्रतीक है, जो सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए भी आवश्यक है।

सड़क की धूल: एक बड़ी चुनौती और उसका समाधान

सड़क की धूल, जिसमें PM2.5 और PM10 जैसे सूक्ष्म कण शामिल होते हैं, भारत के शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में वायु प्रदूषण का एक प्रमुख और लगातार बना रहने वाला स्रोत है। वाहनों की आवाजाही, निर्माण गतिविधियों और हवा के कारण यह धूल वातावरण में फैलती है, जिससे सांस लेने में तकलीफ, हृदय रोग और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए, आवंटित 68% राशि का उपयोग मैकेनिकल स्वीपिंग मशीनों की खरीद, सड़कों पर पानी का नियमित छिड़काव, ग्रीन बेल्ट का विकास करके धूल को उड़ने से रोकने और बेहतर सड़क निर्माण सामग्री के उपयोग जैसे उपायों पर किया गया है। कई शहरों में सड़कों की नियमित धुलाई और वैक्यूम क्लीनिंग भी शुरू की गई है, जिससे सड़कों पर जमा धूल को प्रभावी ढंग से हटाया जा सके। हालांकि, भारत के विशाल सड़क नेटवर्क और लगातार बढ़ती शहरीकरण की गति को देखते हुए, सड़क की धूल का प्रभावी ढंग से प्रबंधन करना एक जटिल और सतत प्रक्रिया है। इन प्रयासों का लक्ष्य सड़कों पर धूल के संचय को कम करना और उसे हवा में फैलने से रोकना है, जिससे समग्र वायु गुणवत्ता में सुधार हो सके और नागरिकों को स्वच्छ हवा मिल सके।

2023 में वायु प्रदूषण से भयावह मौतें और स्वास्थ्य पर प्रभाव

वायु प्रदूषण के घातक प्रभावों का सबसे भयावह प्रमाण 2023 में सामने आए आंकड़ों में मिलता है, जब इस अदृश्य दुश्मन के कारण 20 लाख से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवाई। यह आंकड़ा न केवल चिंताजनक है बल्कि यह भी दर्शाता है कि प्रदूषण नियंत्रण के प्रयासों को और अधिक तेज करने की आवश्यकता है। वायु प्रदूषण सीधे तौर पर श्वसन संबंधी बीमारियों जैसे अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और फेफड़ों के कैंसर का कारण बनता है। इसके अलावा, यह हृदय रोग, स्ट्रोक, मधुमेह और बच्चों में संज्ञानात्मक विकास संबंधी समस्याओं से भी जुड़ा हुआ है। गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों पर इसका विशेष रूप से नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिससे जन्म के समय कम वजन और अन्य जटिलताएं हो सकती हैं। इन मौतों के कारण देश को भारी आर्थिक और सामाजिक नुकसान भी उठाना पड़ा है, जिसमें उत्पादकता में कमी, स्वास्थ्य देखभाल पर बढ़ता खर्च और जीवन की गुणवत्ता में गिरावट शामिल है। यह त्रासदी हमें याद दिलाती है कि स्वच्छ हवा केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य और मानव अस्तित्व का एक मौलिक अधिकार है, जिस पर तत्काल ध्यान देना आवश्यक है।

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आगे की राह और भविष्य की चुनौतियाँ

वायु प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई में ₹13 हजार करोड़ का निवेश और सड़क की धूल पर केंद्रित 68% खर्च निश्चित रूप से महत्वपूर्ण कदम हैं, लेकिन यह केवल शुरुआत है। भविष्य में, एक अधिक एकीकृत और बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है जिसमें न केवल सड़क की धूल, बल्कि औद्योगिक उत्सर्जन, वाहनों का प्रदूषण, कृषि अवशेष जलाना, और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन जैसे सभी प्रमुख स्रोतों को लक्षित किया जाए। शहरों की नियोजन प्रक्रिया में हरित अवसंरचना को प्राथमिकता देना, सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना और ऊर्जा के स्वच्छ स्रोतों की ओर संक्रमण भी अत्यंत आवश्यक है। प्रौद्योगिकी का उपयोग करके वायु गुणवत्ता की निगरानी को मजबूत करना और डेटा-संचालित नीतियों का निर्माण करना भी महत्वपूर्ण होगा, ताकि प्रयासों को सही दिशा मिल सके। सबसे बढ़कर, जन जागरूकता और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी इस लड़ाई में सफलता की कुंजी है, क्योंकि प्रदूषण की चुनौती सामूहिक प्रयासों से ही हल हो सकती है। सरकार, उद्योग और नागरिक समाज के बीच तालमेल बिठाकर ही हम इस गंभीर चुनौती का सामना कर सकते हैं और यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि भविष्य में 2023 जैसी भयावह मौतों के आंकड़ों को दोहराया न जाए, बल्कि इसके बजाय हम एक स्वच्छ, स्वस्थ और सतत भारत की ओर बढ़ें।

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लेखक
Dipti Das
दिप्ति दास साकार भारत की रिपोर्टर हैं। वे छत्तीसगढ़ और देश की ताज़ा खबरें, राजनीति, समाज और जनहित के विषयों पर रिपोर्ट करती हैं।

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