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मातृ-शिशु मृत्यु दर छत्तीसगढ़: आंकड़े, कारण और सरकार के कदम

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मातृ-शिशु मृत्यु दर छत्तीसगढ़: आंकड़े, कारण और सरकार के कदम
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छत्तीसगढ़ राज्य में मातृ मृत्यु दर (MMR) और शिशु मृत्यु दर (IMR) को कम करना एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई है। इन दरों में कमी लाने के लिए राज्य सरकार लगातार प्रयास कर रही है, लेकिन राष्ट्रीय औसत की तुलना में छत्तीसगढ़ की स्थिति अभी भी चिंताजनक है। यह मुद्दा न केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य बल्कि सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि उच्च मृत्यु दर स्वस्थ समाज के निर्माण में बाधा डालती है। इस लेख में हम छत्तीसगढ़ में मातृ एवं शिशु मृत्यु दर के वर्तमान आंकड़ों, उनके पीछे के प्रमुख कारणों और राज्य सरकार द्वारा इन चुनौतियों से निपटने के लिए उठाए गए विभिन्न कदमों का विस्तृत विश्लेषण करेंगे।

छत्तीसगढ़ में मातृ मृत्यु दर (MMR) की स्थिति

मातृ मृत्यु दर (MMR) प्रति एक लाख जीवित जन्मों पर गर्भावस्था या प्रसव के दौरान या उसके 42 दिनों के भीतर होने वाली माताओं की मृत्यु की संख्या को दर्शाती है। छत्तीसगढ़ में मातृ मृत्यु दर में गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन यह अभी भी राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है। सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) 2018-20 की रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़ में मातृ मृत्यु दर 137 प्रति लाख जीवित जन्म है। यह आंकड़ा SRS 2014-16 की 159 से घटकर 137 पर आया है, जो सुधार का संकेत है, लेकिन राष्ट्रीय औसत 97 की तुलना में यह अब भी काफी ऊंचा है। मातृ मृत्यु के प्रमुख कारणों में रक्तस्राव, संक्रमण, उच्च रक्तचाप (प्री-एक्लेम्पसिया), असुरक्षित गर्भपात और एनीमिया शामिल हैं। ग्रामीण और आदिवासी बहुल क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच का अभाव, जागरूकता की कमी और कम उम्र में विवाह भी इस समस्या को गंभीर बनाते हैं।

शिशु मृत्यु दर (IMR) और इसके कारण

शिशु मृत्यु दर (IMR) प्रति एक हजार जीवित जन्मों पर एक वर्ष से कम उम्र के शिशुओं की मृत्यु की संख्या को दर्शाता है। छत्तीसगढ़ में शिशु मृत्यु दर भी राष्ट्रीय औसत से अधिक है। नवीनतम SRS 2020 के आंकड़ों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में शिशु मृत्यु दर 38 प्रति हजार जीवित जन्म है। यह SRS 2019 की 40 से घटकर 38 हुई है। हालांकि, यह राष्ट्रीय औसत 28 से काफी अधिक है। शिशु मृत्यु दर में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में भी अंतर देखा गया है, जहां ग्रामीण क्षेत्रों में यह 42 है और शहरी क्षेत्रों में 29 है। शिशु मृत्यु के प्रमुख कारणों में नवजात शिशुओं में संक्रमण, समय से पूर्व जन्म, जन्म के समय कम वजन, निमोनिया, डायरिया, टीकाकरण की कमी और कुपोषण शामिल हैं। गर्भवती माताओं में एनीमिया और कुपोषण भी शिशुओं के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।

सरकार द्वारा उठाए गए प्रमुख कदम और पहल

छत्तीसगढ़ सरकार ने मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं और कार्यक्रम शुरू किए हैं:।

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मुख्यमंत्री सुपोषण योजना:2 अक्टूबर 2019 को शुरू की गई यह योजना राज्य में कुपोषण और एनीमिया से लड़ने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल है। इसके तहत छह वर्ष तक के बच्चों और 15 से 49 वर्ष की महिलाओं को पोषक आहार प्रदान किया जाता है*, जिससे उनके स्वास्थ्य में सुधार हो सके।

दाई-दीदी क्लीनिक योजना: यह योजना विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों के लिए मुफ्त स्वास्थ्य जांच और उपचार* प्रदान करती है। इसमें महिला डॉक्टरों और कर्मचारियों द्वारा परामर्श दिया जाता है, जिससे महिलाएं अपनी स्वास्थ्य समस्याओं को खुलकर साझा कर सकें।

हमर अस्पताल योजना: इस योजना का उद्देश्य राज्य के स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों में बुनियादी ढांचे और सुविधाओं को बेहतर बनाना* है, ताकि लोगों को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें।

* संस्थागत प्रसव को बढ़ावा: सरकार ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों में संस्थागत प्रसव को बढ़ावा दे रही है, ताकि डिलीवरी प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों की देखरेख में सुरक्षित वातावरण में हो। इससे प्रसव संबंधी जटिलताओं को कम किया जा सके।

जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (JSSK): यह केंद्र प्रायोजित योजना गर्भवती महिलाओं और बीमार नवजात शिशुओं को मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं, दवाएं, जांच और परिवहन सुविधा* प्रदान करती है।

प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (PMSMA): इस अभियान के तहत हर महीने की 9 तारीख को गर्भवती महिलाओं को विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा मुफ्त स्वास्थ्य जांच* प्रदान की जाती है।

* टीकाकरण अभियान: बच्चों को जानलेवा बीमारियों से बचाने के लिए नियमित टीकाकरण अभियानों को मजबूत किया जा रहा है।

मोबाइल मेडिकल यूनिट्स और एंबुलेंस सेवाओं का विस्तार भी किया गया है ताकि दूरदराज के क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाई जा सकें। इसके अतिरिक्त, स्वास्थ्य कर्मियों का प्रशिक्षण और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (मितानिनों) की भूमिका* को सशक्त किया जा रहा है ताकि जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य जागरूकता और सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित हो सके।

इन प्रयासों के बावजूद, छत्तीसगढ़ को अभी भी इस दिशा में लंबा रास्ता तय करना है। दुर्गम भौगोलिक स्थिति, स्वास्थ्य सुविधाओं की गुणवत्ता, प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों की कमी, सामाजिक-आर्थिक असमानताएं और जागरूकता की कमी जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। इन दरों को राष्ट्रीय औसत तक लाने के लिए निरंतर नवाचार, अंतर-विभागीय समन्वय और सामुदायिक भागीदारी आवश्यक है।

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