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कमरछठ: छत्तीसगढ़ का पुत्र कामना और दीर्घायु का अनूठा लोकपर्व

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कमरछठ: छत्तीसगढ़ का पुत्र कामना और दीर्घायु का अनूठा लोकपर्व
छत्तीसगढ़

कमरछठ, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के कुछ ग्रामीण अंचलों में मनाया जाने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अनोखा लोकपर्व है, जिसे माताएं अपनी संतानों, विशेषकर पुत्रों की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य के लिए रखती हैं। यह पर्व हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन माताएं पूरे दिन निर्जला व्रत रखती हैं और विशेष पूजा-अर्चना करती हैं। इस साल कमरछठ का त्योहार 26 अगस्त, 2024 को मनाया जाएगा। यह पर्व न केवल संतान के प्रति माँ के अगाध प्रेम को दर्शाता है, बल्कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध कृषि संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति सम्मान को भी उजागर करता है।

कमरछठ पर्व का महत्व और मान्यताएं

कमरछठ पर्व का गहरा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से संतान को दीर्घायु प्राप्त होती है और वे सभी प्रकार के रोगों तथा कष्टों से मुक्त रहते हैं। यह पर्व मुख्य रूप से पुत्रों के लिए रखा जाता है, लेकिन कई माताएं अपनी सभी संतानों के कल्याण के लिए भी इसे मनाती हैं। जो माताएं पुत्र प्राप्ति की कामना करती हैं, वे भी इस व्रत को श्रद्धापूर्वक रखती हैं। इस त्योहार को हल षष्ठी या हर छठ के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यह भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम जी के जन्मोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। बलराम जी का मुख्य शस्त्र हल था, और यही कारण है कि इस पर्व में हल से जोती गई किसी भी वस्तु का उपयोग नहीं किया जाता। यह प्रकृति के प्रति सम्मान और पारंपरिक, जैविक कृषि पद्धतियों के महत्व को रेखांकित करता है। यह पर्व ग्रामीण जीवनशैली और मिट्टी से जुड़े होने का भी प्रतीक है।

विशेष पूजा विधि और सामग्री

कमरछठ की पूजा विधि अत्यंत विशिष्ट और पारंपरिक है। माताएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और निर्जला व्रत का संकल्प लेती हैं। पूजा के लिए घर के आंगन या किसी स्वच्छ स्थान पर एक छोटा सा गड्ढा खोदकर उसे प्रतीक रूप में तालाब का स्वरूप दिया जाता है। इस गड्ढे के चारों ओर छह छोटे मटके रखे जाते हैं और उनकी पूजा की जाती है। मुख्य पूजा षष्ठी माता की होती है, जिनकी आराधना संतान के कल्याण के लिए की जाती है। पूजा में उपयोग होने वाली सभी सामग्री की एक खास विशेषता होती है – वे हल-रहित होनी चाहिए, अर्थात बिना हल चलाए उगाई गई हों।

पूजा की महत्वपूर्ण सामग्री में पसहर चावल (बिना हल चलाए उगाया गया धान), महुआ फल, कुसुम फूल, भैंस का दूध, लाल साग, सावन भाजी और छेना शामिल हैं। पूजा के दौरान एक पलाश की टहनी का भी उपयोग किया जाता है, जिसे शुभ माना जाता है। माताएं श्रद्धापूर्वक षष्ठी माता की कथा सुनती हैं, जो इस व्रत के महत्व और फल को बताती है। कथा सुनने के बाद, वे पूजा सामग्री को अर्पित करती हैं और अपनी संतानों के लिए आशीर्वाद मांगती हैं। शाम को व्रत का पारण पसहर चावल और भैंस के दूध से बनी खीर खाकर किया जाता है। यह विशेष भोजन न केवल व्रत तोड़ने का माध्यम है, बल्कि यह पारंपरिक पौष्टिक आहार का भी प्रतीक है।

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छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत में कमरछठ का स्थान

कमरछठ पर्व छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक अभिन्न अंग है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामुदायिक सद्भाव और प्रकृति के साथ मनुष्य के गहरे संबंध का प्रतीक भी है। यह पर्व स्थानीय लोगों को अपनी जड़ों से जोड़े रखता है और उन्हें अपनी कृषि परंपराओं व लोक मान्यताओं का स्मरण कराता है। त्योहार के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में एक विशेष उत्साह और उल्लास देखने को मिलता है, जहाँ महिलाएं एक साथ मिलकर पूजा करती हैं और लोकगीत गाती हैं।

यह पर्व हमें सिखाता है कि कैसे प्रकृति और पर्यावरण का सम्मान करते हुए हम अपनी परंपराओं को जीवित रख सकते हैं। हल-रहित सामग्री का उपयोग न केवल एक धार्मिक नियम है, बल्कि यह प्राकृतिक खेती और टिकाऊ जीवन शैली का संदेश भी देता है। कमरछठ पर्व छत्तीसगढ़ की माटी और संस्कृति का दर्पण है, जो पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं, रीति-रिवाजों और पारिवारिक मूल्यों को सहेज कर रखता है। यह माताओं के त्याग, प्रेम और अटूट विश्वास का पर्व है, जो हर साल नई ऊर्जा और आशा के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार बच्चों को अपने सांस्कृतिक मूल्यों से परिचित कराने का भी एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है।

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