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इंदौर में UPI शुल्क के विरोध में व्यापारियों का 'नो UPI डे' ऐलान

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इंदौर में UPI शुल्क के विरोध में व्यापारियों का 'नो UPI डे' ऐलान
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इंदौर के व्यापारी संगठन यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) लेनदेन पर प्रस्तावित नए शुल्कों के विरोध में एकजुट हो गए हैं। इंदौर व्यापार महासंघ सहित अन्य प्रमुख व्यापारी संघों ने इन शुल्कों को 'डिजिटल इंडिया अभियान में बड़ी बाधा' बताते हुए आगामी 23 सितंबर को 'नो यूपीआई डे' मनाने का ऐलान किया है। इस दिन व्यापारी UPI के माध्यम से होने वाले भुगतान स्वीकार नहीं करेंगे। उनका मानना है कि यह निर्णय न केवल उनके लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ बनेगा, बल्कि डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के प्रयासों को भी कमजोर करेगा, जिससे उपभोक्ता नकदी आधारित लेनदेन की ओर लौट सकते हैं।

विरोध का मुख्य कारण और व्यापारियों की चिंताएं

व्यापारियों के इस विरोध प्रदर्शन का मूल कारण नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) या सरकार द्वारा किसी अन्य नियामक संस्था द्वारा UPI लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) या इसी तरह के अन्य शुल्कों को लागू करने का प्रस्ताव है। अब तक, UPI लेनदेन, विशेष रूप से छोटे और मध्यम आकार के व्यवसायों के लिए, लागत-मुक्त रहा है। व्यापारियों का तर्क है कि यदि ये शुल्क लागू होते हैं, तो उनकी परिचालन लागत में काफी वृद्धि होगी। छोटे व्यापारी, जिनके लाभ मार्जिन पहले से कम हैं, इन अतिरिक्त शुल्कों को वहन करने में असमर्थ होंगे।

इंदौर व्यापार महासंघ के अध्यक्ष, श्री रमेशचंद्र अग्रवाल ने बताया, "UPI ने डिजिटल भुगतान को सुलभ बनाया है, लेकिन नए शुल्क इसे फिर से महंगा बना देंगे।" उनका मानना है कि शुल्क लगने से व्यापारी अपना बोझ ग्राहकों पर डालने को मजबूर होंगे, जिससे कीमतें बढ़ सकती हैं, या वे UPI का उपयोग बंद कर नकद लेनदेन पर लौट सकते हैं। यह डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक होगा।

'नो यूपीआई डे' की रणनीति और अपेक्षित परिणाम

23 सितंबर को मनाए जाने वाले 'नो यूपीआई डे' की रणनीति स्पष्ट है: सरकार और संबंधित नियामक संस्थाओं का ध्यान आकर्षित करना। इस दिन इंदौर के सभी छोटे-बड़े व्यापारी, जिनमें किराना स्टोर, रेस्तरां, दवा दुकानें और अन्य खुदरा विक्रेता शामिल हैं, UPI भुगतान स्वीकार करने से इनकार करेंगे। वे ग्राहकों से नकद भुगतान या वैकल्पिक डिजिटल माध्यमों जैसे डेबिट/क्रेडिट कार्ड का उपयोग करने का आग्रह करेंगे। इस कदम का उद्देश्य UPI शुल्क का व्यापारियों और आम जनता पर संभावित गहरे प्रभाव को दर्शाना है।

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व्यापारी संगठनों को उम्मीद है कि इस एक दिवसीय सांकेतिक हड़ताल से सरकार पर दबाव बनेगा और वह UPI लेनदेन पर प्रस्तावित शुल्कों को वापस लेने पर विचार करेगी। व्यापारी नेता, श्री संजय गुप्ता ने कहा, "हमारा लक्ष्य अपनी जायज मांगों को सरकार तक पहुंचाना है। UPI की सफलता का कारण इसका शुल्क-मुक्त होना है।" उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि सरकार ध्यान नहीं देती है, तो भविष्य में बड़े विरोध प्रदर्शन किए जा सकते हैं, जिसमें अन्य शहरों के व्यापारी भी शामिल होंगे।

डिजिटल इंडिया अभियान पर संभावित नकारात्मक प्रभाव

UPI को भारत में डिजिटल भुगतान क्रांति का एक स्तंभ माना जाता है, जिसने लाखों लोगों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ा है। अब तक, UPI ने बिना किसी शुल्क के काम किया है, जिससे यह आम आदमी और छोटे व्यवसायी दोनों के लिए आकर्षक विकल्प बना है। यदि इस पर शुल्क लगाया जाता है, तो यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'डिजिटल इंडिया' और 'कैशलेस इकॉनमी' के सपनों को सीधा झटका देगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि UPI पर शुल्क लगाने से डिजिटल लेनदेन की संख्या में कमी आ सकती है, क्योंकि व्यापारी और ग्राहक दोनों अतिरिक्त लागत से बचने के लिए नकदी का विकल्प चुनेंगे। इससे न केवल वित्तीय समावेशन धीमी होगी, बल्कि पारदर्शिता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। डिजिटल इंडिया का उद्देश्य देश में डिजिटल सेवाओं का विस्तार करना है। UPI पर शुल्क लगाने का निर्णय इस मूल भावना के विपरीत होगा और भारत की डिजिटल प्रगति को पीछे धकेल सकता है। सरकार को इस संबंध में परिणामों पर विचार करना चाहिए और UPI को जन-केंद्रित और लागत-मुक्त बनाए रखने के लिए उपयुक्त समाधान खोजना चाहिए।

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लेखक
Dipti Das
दिप्ति दास साकार भारत की रिपोर्टर हैं। वे छत्तीसगढ़ और देश की ताज़ा खबरें, राजनीति, समाज और जनहित के विषयों पर रिपोर्ट करती हैं।

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