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पुरी में महाप्रभु का भव्य ‘सुनाबेश’: स्वर्ण आभूषणों में दर्शन देंगे भगवान

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पुरी में महाप्रभु का भव्य ‘सुनाबेश’: स्वर्ण आभूषणों में दर्शन देंगे भगवान
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आज, शनिवार, 25 जुलाई 2026 को ओडिशा के पवित्र पुरी धाम में भगवान श्री जगन्नाथ की वार्षिक रथयात्रा के समापन चरण में एक अत्यंत भव्य और अलौकिक आयोजन हुआ। जगत के नाथ भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और देवी सुभद्रा ने सिंहद्वार के सामने खड़े अपने-अपने रथों पर भक्तों को पवित्र 'सुनाबेश' (सोना वेश) में दर्शन दिए। यह विशेष अवसर, जिसे वर्ष भर में होने वाले छह सुनाबेशों में सबसे आकर्षक और महत्वपूर्ण माना जाता है, लाखों श्रद्धालुओं के लिए दिव्य और अविस्मरणीय अनुभव लेकर आया। भक्तगण इस दुर्लभ स्वर्ण शृंगार के दर्शन कर अपने कोटि जन्मों के पापों से मुक्ति और असीम पुण्य की प्राप्ति की कामना लेकर पुरी पहुंचे थे, जिससे पूरा क्षेत्र भक्ति और आध्यात्मिकता से ओत-प्रोत हो गया। पुरी में भक्तों का सैलाब उमड़ा है, और हर तरफ 'जय जगन्नाथ' के जयकारे गूंज रहे हैं, जो इस पावन अवसर की अद्वितीय गरिमा को दर्शाते हैं।

अलौकिक स्वर्ण शृंगार और उसका महत्व

आज शाम जगत के नाथ भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और देवी सुभद्रा बहुमूल्य स्वर्ण आभूषणों से सुशोभित होकर रथों पर विराजमान हुए। यह दृश्य इतना मनमोहक था कि हर भक्त की आँखें प्रभु के इस दिव्य रूप को निहारती रह गईं। इन स्वर्ण आभूषणों में विभिन्न प्रकार के अलंकरण शामिल थे, जो देव विग्रहों की शोभा को कई गुना बढ़ा रहे थे। यह सुनाबेश न केवल कलात्मक सौंदर्य का प्रतीक है, बल्कि इसका गहरा आध्यात्मिक महत्व भी है। सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, रथ पर प्रभु के इस दिव्य स्वर्ण रूप के दर्शन करने से भक्त के कोटि जन्मों के पाप कट जाते हैं और उसे असीम पुण्य की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि इस विशेष सुनाबेश के दर्शन के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पुरी धाम की यात्रा करते हैं। यह सुनाबेश उस परंपरा और आस्था का प्रतीक है, जो सदियों से चली आ रही है और हर वर्ष भक्तों को अविस्मरणीय आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करती है। पुरी का माहौल इस दौरान अभूतपूर्व ऊर्जा और भक्तिभाव से भर जाता है।

सुनाबेश की विस्तृत नीतियाँ और समय सारणी

महाप्रभु के सुनाबेश के आयोजन के लिए एक विस्तृत नीति (अनुष्ठान) और समय सारणी का पालन किया गया, जो पुरी मंदिर की प्राचीन परंपराओं का अभिन्न अंग है। दिन भर विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए, जिनकी शुरुआत भोर से ही हो गई थी।

* सुबह 06:00 से 06:30 बजे तक मंगला आरती का आयोजन किया गया, जिसने दिन की पवित्र शुरुआत की।

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* इसके बाद सुबह 08:00 से 09:00 बजे तक अबकाश एवं वेश की नीतियाँ पूरी की गईं।

* पूर्वाह्न 11:00 से दोपहर 12:00 बजे तक सकाल धूप (प्रथम भोग) अर्पित किया गया।

* दोपहर 02:00 से 03:00 बजे तक मध्याह्न धूप (द्वितीय भोग) की रस्म निभाई गई।

* शाम 05:00 से 06:30 बजे के बीच मुख्य सुनाबेश (स्वर्ण शृंगार) का समय निर्धारित था, जब भगवान ने भक्तों को अपने स्वर्णमंडित रूप में दर्शन दिए। यह वह समय था जब भक्तों की भीड़ चरम पर थी।

* रात 08:00 से 09:00 बजे तक संध्या धूप (तृतीय भोग) अर्पित किया गया।

* रात 10:00 से 11:00 बजे तक सुनाबेश मैलम की नीति हुई, जिसमें आभूषणों को उतारा गया।

* मध्यरात्रि 12:00 से 12:30 बजे तक बड़ासिंहार वेश एवं भोग का आयोजन हुआ।

अंत में, भोर 04:00 बजे हरि शयन नीति एवं रात्रि पहुड़ा के साथ दिन भर के अनुष्ठानों का समापन हुआ। ये नीतियाँ न केवल धार्मिक महत्व रखती हैं, बल्कि पुरी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतिनिधित्व करती हैं।*

भक्तों का सैलाब और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम

महाप्रभु के सुनाबेश के इस अलौकिक दर्शन के लिए पुरी धाम में लाखों श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। बड़डांड (रथ मार्ग) और उसके आसपास का पूरा क्षेत्र भक्तों से खचाखच भरा हुआ था। यह दृश्य अपने आप में एक अद्भुत अनुभव था, जहाँ भक्ति और उत्साह का संगम देखने को मिल रहा था। इतनी भारी भीड़ को देखते हुए मंदिर प्रशासन और स्थानीय पुलिस की ओर से व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की गई थी। भक्तों के सुचारू और सुरक्षित दर्शन सुनिश्चित करने के लिए विशेष पुलिस बल की तैनाती की गई थी। रथ मार्ग पर भीड़ नियंत्रण के लिए पुख्ता इंतजाम किए गए थे, ताकि किसी भी प्रकार की अव्यवस्था से बचा जा सके। प्रवेश और निकास द्वारों पर कड़ी निगरानी रखी गई और आपातकालीन सेवाओं को भी सक्रिय रखा गया। प्रशासन ने यह सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास किया कि सभी भक्त शांतिपूर्ण ढंग से प्रभु के दर्शन कर सकें और यह पावन अवसर किसी भी अप्रिय घटना के बिना संपन्न हो। सुरक्षा कर्मियों ने दिन-रात एक कर व्यवस्था बनाए रखी, जिससे लाखों भक्तों को सुरक्षित और यादगार दर्शन का अनुभव मिल सका।

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