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प्राकृतिक गैस: बढ़ती मांग, सप्लाई बनी चुनौती

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प्राकृतिक गैस: बढ़ती मांग, सप्लाई बनी चुनौती
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भारत में ऊर्जा की बढ़ती मांग के बीच प्राकृतिक गैस (Natural Gas) तेजी से एक महत्वपूर्ण ईंधन के रूप में उभर रही है। स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में बढ़ते कदमों के साथ सरकार और उद्योग दोनों प्राकृतिक गैस के उपयोग को बढ़ावा दे रहे हैं। हालांकि, इसके साथ आपूर्ति, कीमत और निर्भरता जैसी चुनौतियां भी सामने आ रही हैं।

प्राकृतिक गैस मूल रूप से एक जीवाश्म ईंधन है, जो करोड़ों वर्षों पहले जैविक पदार्थों के विघटन से बनी है। इसमें मुख्य रूप से मीथेन गैस होती है, जो 80-90% तक होती है। यह गैस भूमिगत भंडारों में पाई जाती है और इसे पाइपलाइन या LNG के रूप में उपयोगकर्ताओं तक पहुंचाया जाता है।

ऊर्जा क्षेत्र में प्राकृतिक गैस को सबसे स्वच्छ जीवाश्म ईंधन माना जाता है, क्योंकि यह कोयले और पेट्रोलियम की तुलना में कम कार्बन उत्सर्जन करती है। इसी कारण भारत में इसे “ट्रांजिशन फ्यूल” यानी संक्रमणकालीन ईंधन के रूप में देखा जा रहा है, जो पारंपरिक ईंधनों से हरित ऊर्जा की ओर ले जाने में मदद करता है।

देश में प्राकृतिक गैस का उपयोग कई क्षेत्रों में तेजी से बढ़ रहा है। घरों में खाना पकाने के लिए PNG (पाइप्ड नेचुरल गैस), वाहनों में CNG, बिजली उत्पादन, उर्वरक निर्माण और पेट्रोकेमिकल उद्योग में इसका व्यापक इस्तेमाल हो रहा है। खासतौर पर उर्वरक उद्योग में इसका महत्व बहुत अधिक है, जहां अमोनिया उत्पादन के लिए यह मुख्य कच्चा माल है।

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हाल के वर्षों में सरकार ने शहर गैस वितरण (CGD) नेटवर्क का विस्तार किया है, जिससे लाखों घरों और उद्योगों तक गैस पहुंच रही है। कई शहरों में PNG कनेक्शन तेजी से बढ़ रहे हैं, जिससे लोगों को सस्ता और सुरक्षित ईंधन मिल रहा है। साथ ही CNG वाहनों की संख्या बढ़ने से प्रदूषण में कमी लाने में भी मदद मिली है।

हालांकि, इस क्षेत्र में कुछ गंभीर चुनौतियां भी सामने आई हैं। हाल की खबरों के अनुसार, गैस सप्लाई में कमी के कारण उर्वरक उत्पादन पर असर पड़ा है। देश में यूरिया उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई है, जिससे कृषि क्षेत्र पर दबाव बढ़ सकता है। यह स्थिति बताती है कि गैस की उपलब्धता और वितरण में संतुलन बनाना कितना जरूरी है।

भारत अभी भी अपनी गैस जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, जिससे वैश्विक बाजार में उतार-चढ़ाव का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। रूस-यूक्रेन जैसे वैश्विक संकटों ने यह दिखाया है कि आयातित गैस पर निर्भरता ऊर्जा सुरक्षा के लिए जोखिम बन सकती है।

इसके अलावा, भविष्य में गैस की मांग तेजी से बढ़ने की संभावना है। अनुमान है कि उद्योग और बिजली उत्पादन क्षेत्र में गैस की खपत में बड़ा इजाफा होगा, खासकर उर्वरक और रिफाइनरी सेक्टर में। ऐसे में घरेलू उत्पादन बढ़ाने और LNG आयात ढांचे को मजबूत करना जरूरी हो गया है।

सरकार अब प्राकृतिक गैस के साथ हाइड्रोजन जैसे स्वच्छ ईंधनों को जोड़ने की दिशा में भी काम कर रही है। हाल के प्रयोगों में गैस के साथ हाइड्रोजन मिलाकर उपयोग करने की दिशा में सकारात्मक परिणाम मिले हैं, जो भविष्य की हरित ऊर्जा नीति का हिस्सा बन सकते हैं।

कुल मिलाकर, प्राकृतिक गैस भारत के ऊर्जा संक्रमण का अहम हिस्सा बन चुकी है। यह न केवल प्रदूषण कम करने में मदद कर रही है, बल्कि औद्योगिक विकास और ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूती दे रही है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि देश गैस के घरेलू उत्पादन, इंफ्रास्ट्रक्चर और नीति स्तर पर मजबूत कदम उठाए, ताकि भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को संतुलित तरीके से पूरा किया जा सके।

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लेखक
Aameen Parveen
Aameen Parveen is a reporter at Sakar Bharat, covering local news, civic issues, and ground reports with accuracy, clarity, and strong public focus.