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समुद्र मंथन से जुड़ा श्रावण मास, शिवजी को क्यों है प्रिय

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समुद्र मंथन से जुड़ा श्रावण मास, शिवजी को क्यों है प्रिय
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समुद्र मंथन से जुड़ा श्रावण मास, जानिए सावन भगवान शिव को क्यों है इतना प्रिय

30 जुलाई से श्रावण मास का शुभारंभ होने जा रहा है। सनातन धर्म में यह महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र और पुण्यदायी माना जाता है। मान्यता है कि सावन के दौरान श्रद्धापूर्वक शिव पूजन, रुद्राभिषेक, जलाभिषेक और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से जीवन के अनेक कष्ट दूर होते हैं तथा सुख, समृद्धि और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।

वास्तु गुरु राणा सिकंदर जी के अनुसार श्रावण मास केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक जागरण का भी प्रतीक है। इस माह में भगवान शिव की उपासना करने से घर-परिवार में सकारात्मक वातावरण बनता है और व्यक्ति के मन में आत्मविश्वास, संयम तथा नई ऊर्जा का संचार होता है।

समुद्र मंथन और श्रावण मास का संबंध

पौराणिक कथाओं के अनुसार देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए क्षीरसागर का समुद्र मंथन किया था। मंथन के दौरान सबसे पहले अत्यंत विषैला हलाहल विष निकला, जिसकी ज्वाला से तीनों लोक संकट में पड़ गए। संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष का पान कर लिया और उसे अपने कंठ में धारण किया। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया, जिसके कारण उन्हें नीलकंठ कहा जाने लगा।

मान्यता है कि भगवान शिव के शरीर की तपन को शांत करने के लिए देवताओं ने उन पर निरंतर गंगाजल अर्पित किया। इसी परंपरा के आधार पर आज भी सावन में शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और भांग अर्पित की जाती है।

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सावन में शिव आराधना का महत्व

वास्तु गुरु राणा सिकंदर जी बताते हैं कि श्रावण मास आत्मशुद्धि, संयम और सकारात्मक सोच विकसित करने का श्रेष्ठ अवसर है। इस दौरान नियमित शिव मंत्रों का जाप, रुद्राभिषेक, दान-पुण्य और सात्विक जीवनशैली अपनाने से मानसिक तनाव कम होता है तथा परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।

वे कहते हैं कि घर के ईशान कोण की स्वच्छता बनाए रखना, पूजा स्थल पर नियमित दीपक जलाना और शिवलिंग पर श्रद्धापूर्वक जल अर्पित करना सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाने में सहायक माना जाता है। हालांकि इन मान्यताओं का आधार धार्मिक आस्था और परंपराएं हैं।

श्रावण मास में देशभर के शिव मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है। लाखों श्रद्धालु कांवड़ यात्रा कर पवित्र नदियों से जल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करते हैं। यह महीना भक्ति, श्रद्धा, तप और आध्यात्मिक साधना का प्रतीक माना जाता है, जो भक्तों को भगवान शिव के प्रति अपनी आस्था प्रकट करने का विशेष अवसर प्रदान करता है।

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