छत्तीसगढ़ के किसानों ने वांगचुक का किया समर्थन, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग
छत्तीसगढ़ के किसानों ने हाल ही में लद्दाख में शिक्षाविद् और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन को अपना पूर्ण समर्थन दिया है। किसानों ने केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के तत्काल इस्तीफे की मांग करते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के नाम एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा। यह कदम तब उठाया गया है जब छत्तीसगढ़ के आदिवासी और किसान समुदाय लंबे समय से हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोयला खनन परियोजनाओं के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं, उनका आरोप है कि इन परियोजनाओं से उनकी आजीविका और पर्यावरण को गंभीर खतरा है। किसानों का यह आंदोलन न केवल स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरणीय न्याय और आदिवासी अधिकारों की लड़ाई से भी जुड़ गया है, जिसका प्रतिनिधित्व सोनम वांगचुक का उपवास कर रहा है।
वांगचुक के आंदोलन को समर्थन और किसानों की एकजुटता
लद्दाख में सोनम वांगचुक का उपवास, जिसे उन्होंने 'जलवायु उपवास' नाम दिया है, लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची के तहत विशेष दर्जा देने और क्षेत्र के ग्लेशियरों तथा पर्यावरण की रक्षा की मांग को लेकर चल रहा है। छत्तीसगढ़ के किसानों ने इस आंदोलन में गहरी समानता देखी है। भूमि बचाओ संघर्ष समिति और हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति जैसे प्रमुख किसान संगठनों ने एक संयुक्त बयान जारी कर कहा कि वांगचुक का संघर्ष उनके अपने संघर्ष का ही प्रतिबिंब है। उन्होंने जोर दिया कि जिस तरह लद्दाख के लोग अपनी पहचान, संस्कृति और पर्यावरण को बचाने के लिए लड़ रहे हैं, उसी तरह छत्तीसगढ़ के आदिवासी और किसान भी हसदेव जैसे क्षेत्रों में अपनी जल, जंगल, जमीन की रक्षा के लिए संघर्षरत हैं। किसानों का मानना है कि दोनों ही आंदोलनों का मूल उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और स्थानीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा करना है। इस समर्थन के माध्यम से, छत्तीसगढ़ के किसानों ने अपनी आवाज को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर मजबूती से रखने का प्रयास किया है।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग: कारण और आरोप
छत्तीसगढ़ के किसानों ने केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के पीछे कई गंभीर आरोप लगाए हैं। किसानों का दावा है कि प्रधान, जो पहले केंद्रीय कोयला मंत्री भी रह चुके हैं, ने हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोयला खनन परियोजनाओं को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिससे आदिवासियों और किसानों के हितों की अनदेखी हुई है। किसानों का आरोप है कि प्रधान ने कॉर्पोरेट घरानों के पक्ष में नीतियां बनाईं और स्थानीय समुदायों की आपत्तियों को लगातार खारिज किया। विशेष रूप से, हसदेव क्षेत्र में पेड़ों की कटाई और खनन गतिविधियों के कारण जैव विविधता को भारी नुकसान हुआ है, और कई गांवों को विस्थापन का खतरा सता रहा है। किसानों ने कहा कि धर्मेंद्र प्रधान ने अपने कार्यकाल में पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी अधिकारों की रक्षा के बजाय खनन उद्योग को प्राथमिकता दी। उनका मानना है कि ऐसे मंत्री को पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है, जो जनहित के बजाय विशेष हितों को बढ़ावा दे। यह मांग उनके प्रति गहरा आक्रोश और विश्वासघात की भावना को दर्शाती है।
राष्ट्रपति को ज्ञापन और भविष्य की रणनीति
किसानों ने अपनी मांगों को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा है। ज्ञापन में उन्होंने सोनम वांगचुक के आंदोलन का समर्थन करते हुए लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग की है। साथ ही, उन्होंने हसदेव अरण्य में चल रही सभी कोयला खनन परियोजनाओं को तत्काल रोकने और ग्राम सभाओं की सहमति के बिना किसी भी नई परियोजना को मंजूरी न देने की अपील की है। ज्ञापन में धर्मेंद्र प्रधान को उनके कथित जनविरोधी निर्णयों के लिए पद से हटाने की भी मांग की गई है। किसानों ने राष्ट्रपति से अपील की है कि वे इन गंभीर मुद्दों पर तत्काल हस्तक्षेप करें और संविधान प्रदत्त अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करें। किसानों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो वे अपने आंदोलन को और तेज करेंगे और बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन आयोजित करेंगे। इस ज्ञापन के माध्यम से किसानों ने देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक अपनी चिंताओं को पहुंचाने का प्रयास किया है, ताकि उनके संघर्ष को न्याय मिल सके और हसदेव अरण्य जैसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिक तंत्रों को बचाया जा सके। यह कदम उनके संकल्प और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में उनके विश्वास को दर्शाता है।
हसदेव अरण्य का मुद्दा: एक विस्तृत पृष्ठभूमि
हसदेव अरण्य मध्य भारत के सबसे घने और जैव विविधता से भरपूर जंगलों में से एक है, जो छत्तीसगढ़ के कोरबा, सरगुजा और सूरजपुर जिलों में फैला हुआ है। यह क्षेत्र न केवल घने साल के जंगलों और वन्यजीवों का घर है, बल्कि यह आदिवासी समुदायों की सदियों पुरानी संस्कृति और आजीविका का भी केंद्र है। यह क्षेत्र अबूझमाड़ के बाद छत्तीसगढ़ का दूसरा सबसे बड़ा अविभाजित जंगल है। हालांकि, हसदेव अरण्य में कोयले के विशाल भंडार हैं, जिसने इसे खनन कंपनियों के लिए एक आकर्षक लक्ष्य बना दिया है। पिछले कुछ दशकों से, इस क्षेत्र में कोयला खनन परियोजनाओं को लेकर लगातार विवाद और विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं। स्थानीय आदिवासी और किसान समुदाय इन परियोजनाओं का कड़ा विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि खनन से उनकी पवित्र भूमि, जंगल, जल स्रोत और पारंपरिक जीवनशैली नष्ट हो जाएगी। अनेक अध्ययनों ने भी इस क्षेत्र के पारिस्थितिक महत्व और खनन के संभावित विनाशकारी प्रभावों पर प्रकाश डाला है। सरकारों द्वारा खनन लीज दिए जाने के बावजूद, स्थानीय ग्राम सभाओं ने पेसा कानून (Panchayats Extension to Scheduled Areas Act, 1996) के तहत इन परियोजनाओं को अस्वीकृत कर दिया है। यह संघर्ष केवल कोयले के लिए भूमि अधिग्रहण का नहीं, बल्कि विकास बनाम पर्यावरण और कॉर्पोरेट हितों बनाम सामुदायिक अधिकारों का एक बड़ा मुद्दा बन गया है, जिसे अब राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन मिल रहा है।
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