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पवारखेड़ा का नया प्लान: बगास से बिजली, एथेनॉल से किसानों की आय में वृद्धि

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पवारखेड़ा का नया प्लान: बगास से बिजली, एथेनॉल से किसानों की आय में वृद्धि
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देशभर में पेट्रोलियम उत्पादों में एथेनॉल के मिश्रण को बढ़ावा देने की सरकारी योजना के बीच, मध्यप्रदेश के नर्मदापुरम जिले में स्थित पवारखेड़ा के जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के मुख्य गन्ना अनुसंधान केंद्र में एक महत्वपूर्ण पहल की जा रही है। 04 अगस्त 2026 को सामने आई जानकारी के अनुसार, यह केंद्र गन्ने की उन्नत किस्मों पर गहन शोध कर रहा है, जिसका दोहरा लक्ष्य है: एक ओर किसानों की आय में वृद्धि करना और दूसरी ओर शक्कर कारखानों को आर्थिक रूप से अधिक सुदृढ़ बनाना। इस अनुसंधान का मूल उद्देश्य देश की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में आत्मनिर्भरता बढ़ाना और कृषि अपशिष्ट का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करना है।

शर्करा और सुक्रोज वृद्धि का महत्व

गन्ना अनुसंधान केंद्र के मुख्य रिसर्चर ऑस्कर टोप्पो ने बताया कि वर्तमान में केंद्र में ऐसी नई तकनीकों और गन्ने की किस्मों पर विशेष शोध चल रहा है, जिससे गन्ने में शर्करा और सुक्रोज की मात्रा को अधिकतम किया जा सके। यह शोध अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि अलग-अलग गन्ने की किस्मों में शर्करा की मात्रा और उत्पादन क्षमता भिन्न होती है। यदि गन्ने में शर्करा का प्रतिशत अधिक होगा, तो इसका सीधा लाभ चीनी मिलों को मिलेगा, जिन्हें बेहतर रिकवरी प्राप्त होगी। बेहतर रिकवरी का अर्थ है कि कम गन्ने से अधिक चीनी का उत्पादन, जिससे उनकी परिचालन लागत कम होगी और मुनाफा बढ़ेगा। इसी तरह, किसानों को भी उनकी उपज का अधिक मूल्य प्राप्त हो सकेगा, क्योंकि उच्च गुणवत्ता वाले गन्ने की मांग और कीमत दोनों अधिक होती हैं। यह पहल किसानों को उनकी मेहनत का उचित प्रतिफल दिलाने और उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

एथेनॉल उत्पादन में क्रांति

भारत सरकार का एक प्रमुख लक्ष्य कच्चे तेल के आयात और खपत को कम करके देश को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पेट्रोल में एथेनॉल का सम्मिश्रण लगातार बढ़ाया जा रहा है। पवारखेड़ा में चल रही रिसर्च से गन्ने से अधिक मात्रा में एथेनॉल प्राप्त करने में मदद मिलेगी। एथेनॉल उत्पादन के लिए विशिष्ट गन्ने की किस्मों और उनकी प्रसंस्करण विधियों पर शोध किया जा रहा है, ताकि प्रति एकड़ गन्ने से अधिकतम एथेनॉल का निष्कर्षण किया जा सके। यह न केवल देश की विदेशी मुद्रा बचाएगा, बल्कि किसानों के लिए गन्ने की बिक्री का एक अतिरिक्त और स्थिर बाजार भी प्रदान करेगा। चीनी मिलें, जो परंपरागत रूप से केवल चीनी उत्पादन पर निर्भर थीं, अब एथेनॉल उत्पादन से भी अपनी आय बढ़ा सकेंगी, जिससे उनकी वित्तीय स्थिरता मजबूत होगी।

बगास से बिजली: एक टिकाऊ ऊर्जा समाधान

पवारखेड़ा अनुसंधान केंद्र का नया प्लान केवल शर्करा और एथेनॉल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गन्ने के प्रसंस्करण से निकलने वाले उप-उत्पाद, जिसे 'बगास' कहते हैं, का भी प्रभावी उपयोग करने की दिशा में अग्रसर है। बगास, जो गन्ने की पिराई के बाद बचा हुआ रेशेदार अवशेष होता है, पारंपरिक रूप से ईंधन के रूप में या अनुपयोगी मानकर जला दिया जाता था। लेकिन, इस नई योजना के तहत, बगास का उपयोग बिजली उत्पादन के लिए किया जाएगा। यह एक टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल ऊर्जा समाधान है। चीनी मिलें अपने स्वयं के संचालन के लिए बिजली का उत्पादन कर सकेंगी और अतिरिक्त बिजली को ग्रिड में बेचकर आय अर्जित कर सकेंगी। यह कदम न केवल मिलों की परिचालन लागत को कम करेगा, बल्कि उन्हें एक नया राजस्व स्रोत भी प्रदान करेगा। इसके अलावा, बगास का उपयोग करके बिजली उत्पादन जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करेगा और कार्बन उत्सर्जन को भी घटाएगा, जिससे पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा। यह पूरी योजना किसानों को गन्ने के हर हिस्से से लाभ कमाने का अवसर प्रदान करती है, जिससे उनकी आय में कई गुना वृद्धि होने की संभावना है।

उत्पाद लोड हो रहे हैं…

कुल मिलाकर, नर्मदापुरम के पवारखेड़ा स्थित गन्ना अनुसंधान केंद्र द्वारा किया जा रहा यह शोध किसानों की आय बढ़ाने, चीनी मिलों को आर्थिक रूप से मजबूत करने और देश को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बहुआयामी और दूरगामी पहल है। शर्करा वृद्धि, एथेनॉल उत्पादन में इजाफा और बगास से बिजली का निर्माण, ये सभी मिलकर कृषि अपशिष्ट के प्रबंधन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने का एक अनूठा मॉडल प्रस्तुत करते हैं।

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लेखक
Dipti Das
दिप्ति दास साकार भारत की रिपोर्टर हैं। वे छत्तीसगढ़ और देश की ताज़ा खबरें, राजनीति, समाज और जनहित के विषयों पर रिपोर्ट करती हैं।

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