अबूझमाड़ में 'हरे सोने' से बदली 22 गांवों की तकदीर, फड़ गांव तक पहुंचे
छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में स्थित अबूझमाड़ के दुर्गम और घने जंगलों में रहने वाले आदिवासी परिवारों की आजीविका का प्रमुख आधार सदियों से लघु वनोपज रही है। इनमें तेन्दूपत्ता, जिसे स्थानीय लोग 'हरा सोना' भी कहते हैं, उनकी वार्षिक आय का सबसे बड़ा स्रोत है। एक महत्वपूर्ण बदलाव के तहत, साल 2026 में पहली बार 22 गांवों के 365 तेन्दूपत्ता संग्राहकों को अपने ही गांव के पास 10 नए संग्रहण केंद्रों (फड़) पर तेन्दूपत्ता बेचने की सुविधा मिली है। यह पहल नक्सल प्रभाव में कमी और सुरक्षा व्यवस्था में सुधार का सीधा परिणाम है, जिससे इन परिवारों को आर्थिक स्वतंत्रता और सुरक्षा का एक नया अनुभव प्राप्त हुआ है। कुल 8 लाख 86 हजार 897 रुपये की राशि सीधे उनके खातों में हस्तांतरित की गई है, जिससे उनकी वर्षों पुरानी समस्याओं का समाधान हुआ है।
अबूझमाड़ में 'हरे सोने' की नई सुबह
अबूझमाड़ क्षेत्र, जो अपनी भौगोलिक दुर्गमता और कभी-कभार नक्सली गतिविधियों के लिए जाना जाता था, अब विकास की एक नई सुबह देख रहा है। तेन्दूपत्ता, जिसे यहां के ग्रामीण 'हरा सोना' मानते हैं, उनकी आर्थिक रीढ़ है। अतीत में, इस 'हरे सोने' के संग्रहण और विक्रय पर नक्सलियों का गहरा प्रभाव था। ग्रामीण अपनी मर्जी से तेन्दूपत्ता बेच नहीं पाते थे और अक्सर संग्रहण केंद्रों तक पहुंचने के लिए मीलों पैदल चलना पड़ता था, जिसमें जान का जोखिम भी रहता था। लेकिन 31 मार्च, 2026 के बाद क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था को अभूतपूर्व तरीके से मजबूत किया गया है। नक्सल प्रभाव में कमी आने के साथ ही, अबूझमाड़ में विकास कार्यों ने गति पकड़ी है। इसी क्रम में, वर्ष 2026 में पहली बार 10 नए तेन्दूपत्ता संग्रहण फड़ खोले गए हैं, जिसने ग्रामीणों की जिंदगी में एक बड़ा सकारात्मक परिवर्तन ला दिया है। यह कदम न केवल आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में एक मील का पत्थर है, बल्कि यह इस बात का भी प्रमाण है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और बेहतर सुरक्षा व्यवस्था से दुर्गम क्षेत्रों में भी विकास संभव है।
गांव-गांव पहुंचे तेन्दूपत्ता संग्रहण केंद्र
इस पहल के तहत, कलमानार, ओकपाड़, कुतुल, निरामेटा, कोडकानार, कानागांव, कच्चापाल, टेकानार, बांहकेर और रायनार जैसे रणनीतिक स्थानों पर कुल 10 नए तेन्दूपत्ता फड़ स्थापित किए गए हैं। इन केंद्रों की स्थापना से आसपास के 22 गांवों के लोगों को अपने गांव के बेहद करीब ही अपनी उपज बेचने का अवसर मिला है। पहले जहां उन्हें तेन्दूपत्ता बेचने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलकर दूरस्थ केंद्रों तक जाना पड़ता था, वहीं अब यह सुविधा उनके घर के पास ही उपलब्ध है। ग्रामीणों का कहना है कि इस व्यवस्था से उनके समय, श्रम और यात्रा पर होने वाले खर्च, तीनों की बचत हो रही है। यह सुविधा विशेष रूप से उन महिलाओं और बुजुर्गों के लिए वरदान साबित हुई है, जिन्हें पहले भारी बोझ उठाकर लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी। यह न केवल उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करता है, बल्कि उन्हें अधिक तेन्दूपत्ता संग्रहित करने के लिए भी प्रोत्साहित करता है, जिससे उनकी आय में और वृद्धि होती है। इस प्रकार, ये फड़ केवल संग्रहण केंद्र नहीं, बल्कि ग्रामीणों के लिए सुविधा और सुरक्षा के नए द्वार बन गए हैं।
डीबीटी से सीधा लाभ, बदली आर्थिक तस्वीर
इस सीजन में, कुल 365 तेन्दूपत्ता संग्राहकों ने मिलकर 161.254 मानक बोरा तेन्दूपत्ता संग्रहित किया है। इस संग्रहण के एवज में, छत्तीसगढ़ सरकार ने 5,500 रुपये प्रति मानक बोरा की दर से कुल 8 लाख 86 हजार 897 रुपये की राशि सीधे लाभान्वित ग्रामीणों के बैंक खातों में जमा की है। यह भुगतान डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के माध्यम से किया गया है, जिसने बिचौलियों की भूमिका को समाप्त कर पारदर्शिता सुनिश्चित की है। इस सीधे और समय पर भुगतान से ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आया है। यह राशि उनके बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और अन्य आवश्यक घरेलू खर्चों को पूरा करने में मदद कर रही है। जिन 22 गांवों को इस योजना से सीधा लाभ मिला है, उनमें कलमानार, पिड़का, ब्रेहबेड़ा, कंदाड़ी, किशकाल, ओकपाड़, कुतुल, आलबेड़ा, निरामेटा, कोडकानार, कानागांव, कच्चापाल, ताड़ोकुर, टेकानार, नयापारा, मकसोली, हिकपुला, बांहकेर, झोरीगांव, रेंगाबेड़ा, कोकोड़ी और रायनार शामिल हैं। यह एक व्यापक प्रभाव वाली योजना है, जिसने अबूझमाड़ के एक बड़े हिस्से की आर्थिक तस्वीर को बदल दिया है।