घटती घरेलू कीमतें: भारतीय चीनी मिलें आधा ही करेंगी शुल्क-मुक्त आयात
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भारतीय चीनी मिलें और रिफाइनर सरकार द्वारा स्वीकृत 10 लाख मीट्रिक टन शुल्क-मुक्त कच्ची चीनी के कोटे का केवल आधा हिस्सा ही आयात करने की संभावना है। यह निर्णय घरेलू चीनी की कीमतों में आई गिरावट के कारण लिया गया है, जिसने आयात को कम लाभदायक बना दिया है। पिछले सप्ताह, भारत सरकार ने त्योहारी सीजन से पहले रिकॉर्ड-उच्च कीमतों को नियंत्रित करने और उपभोक्ताओं को राहत प्रदान करने के उद्देश्य से 31 अक्टूबर तक के लिए शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी थी। हालांकि, इस घोषणा के बाद से घरेलू बाजार में चीनी की कीमतों में तेजी से गिरावट आई है, जिससे मिलों और रिफाइनरों के लिए आयात का आकर्षण कम हो गया है। उद्योग अधिकारियों के अनुसार, अब ऐसा लगता है कि देश की कुल आयात मात्रा 5 लाख मीट्रिक टन से अधिक नहीं होगी, जिसका अधिकांश हिस्सा बंदरगाह-आधारित रिफाइनरियों द्वारा ही आयात किए जाने की उम्मीद है।
आयात की घटती चमक और घरेलू बाजार की स्थिति
भारत, जो दुनिया का सबसे बड़ा चीनी उपभोक्ता है, ने रिकॉर्ड-उच्च कीमतों से जूझने के बाद घरेलू आपूर्ति बढ़ाने के लिए शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी थी। यह कदम विशेष रूप से त्योहारी सीजन से पहले उठाया गया था, जब पारंपरिक मिठाइयों की मांग चरम पर होती है। हालांकि, सरकार की इस घोषणा के बाद से घरेलू एक्स-मिल कीमतों में लगभग 20% की गिरावट दर्ज की गई है, जो पिछले सप्ताह के रिकॉर्ड उच्च स्तर से काफी नीचे आ गई हैं। मुंबई स्थित व्यापारी MEIR कमोडिटीज इंडिया के प्रबंध निदेशक, राहील शेख ने इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा, "आयात पिछले सप्ताह आकर्षक लग रहा था, जब कीमतें मजबूत और बढ़ रही थीं। लेकिन घोषणा के बाद से कीमतों में आई तेज गिरावट ने मिल मालिकों के लिए आयात की चमक फीकी कर दी है।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि आयात मार्जिन अब बहुत पतला है, और इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि जब शिपमेंट लगभग दो महीने में पहुंचेगा तो यह मार्जिन बना रहेगा। कीमतों में अनिश्चितता और लाभप्रदता में कमी ने चीनी मिलों को आयात के प्रति सतर्क कर दिया है।
रिफाइनरियों की भूमिका और आयात का अनुमान
वर्तमान परिदृश्य में, अधिकांश आयातित मात्रा बंदरगाह-आधारित चीनी रिफाइनरियों द्वारा ही ली जाने की संभावना है। भारत में ऐसी मुट्ठी भर रिफाइनरियां हैं जो कच्ची चीनी का शुल्क-मुक्त आयात करती हैं, उसे परिष्कृत करती हैं और फिर परिणामी सफेद चीनी का निर्यात करती हैं। इन रिफाइनरियों के लिए, आयात का उद्देश्य घरेलू खपत के बजाय निर्यात बाजारों को पूरा करना होता है, जिससे वे घरेलू कीमतों में उतार-चढ़ाव से कुछ हद तक सुरक्षित रहती हैं। राहील शेख और वैश्विक व्यापारिक घरानों के चार अन्य डीलरों ने इस बात पर सहमति व्यक्त की है कि आयात 5 लाख टन से अधिक होने की संभावना नहीं है, और इसका अधिकांश हिस्सा रिफाइनरियों द्वारा ही आयात किया जाएगा। यह अनुमान दर्शाता है कि देश की वास्तविक आवश्यकता और बाजार की गतिशीलता के बीच एक बड़ा अंतर है। सरकार का इरादा घरेलू बाजार को स्थिर करना था, लेकिन गिरती कीमतों ने मिलों के लिए आयात को आर्थिक रूप से अव्यवहारिक बना दिया है, जिससे केवल निर्यात-उन्मुख रिफाइनरियों के लिए ही यह व्यवहार्य विकल्प बचा है।
आगामी आपूर्ति और भविष्य की संभावनाएं
घरेलू चीनी बाजार के लिए एक और महत्वपूर्ण कारक मध्य अक्टूबर से शुरू होने वाले नए सीजन से अपेक्षित आपूर्ति में वृद्धि है। नए सीजन की फसल आने से बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ेगी, जिससे कीमतों पर और दबाव पड़ने की संभावना है। यह आगामी आपूर्ति भी मिलों को बड़े पैमाने पर आयात करने से हतोत्साहित कर रही है, क्योंकि वे पहले से ही घरेलू बाजार में बढ़ती आपूर्ति और गिरती कीमतों के जोखिम का सामना नहीं करना चाहतीं। सरकार का उद्देश्य त्योहारी सीजन से पहले कीमतों को नियंत्रण में रखना था, और घरेलू कीमतों में गिरावट उस उद्देश्य को आंशिक रूप से पूरा करती दिख रही है, भले ही आयात लक्ष्य पूरा न हो। हालांकि, कम आयात का मतलब यह हो सकता है कि घरेलू स्टॉक पर दबाव बना रहे, खासकर यदि नया सीजन उम्मीद से कम उत्पादन देता है। कुल मिलाकर, भारतीय चीनी उद्योग एक जटिल दौर से गुजर रहा है, जहाँ वैश्विक बाजार की कीमतें, घरेलू आपूर्ति-मांग संतुलन और सरकारी नीतियां सभी मिलकर बाजार की दिशा तय कर रही हैं। उद्योग के हितधारक अब नए सीजन की फसल और उसके बाजार पर पड़ने वाले प्रभाव पर बारीकी से नज़र रख रहे हैं।