18वीं लोकसभा: आधे से अधिक विधेयक एक ही सत्र में पारित, डेटा खुलासा
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18वीं लोकसभा में प्रस्तुत किए गए आधे से अधिक विधेयकों को उसी सत्र में पारित कर दिया गया है, जिस सत्र में उन्हें पेश किया गया था। यह महत्वपूर्ण गति पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के आंकड़ों के विश्लेषण से सामने आई है, जो भारतीय संसद में विधायी प्रक्रिया की बढ़ती रफ्तार को दर्शाती है। यह प्रवृत्ति पिछले एक साल में तेजी से बढ़ी है, जिसमें हाल ही में समाप्त हुए मानसून सत्र में विशेष रूप से उल्लेखनीय गति देखी गई। इन आंकड़ों से पता चलता है कि कुल 64 विधेयकों में से 34, यानी 53%, को दोनों सदनों द्वारा उसी सत्र में मंजूरी मिल गई, जिससे संसदीय बहस और जांच के लिए उपलब्ध समय पर सवाल उठ रहे हैं।
विधायी प्रक्रिया में अभूतपूर्व तेजी
18वीं लोकसभा के गठन के बाद से, भारतीय संसद ने विधेयकों को पारित करने की अपनी गति में एक स्पष्ट बदलाव दिखाया है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च द्वारा जुटाए गए डेटा के अनुसार, कुल 64 विधेयकों में से 34 को, जो लगभग 53% है, उसी सत्र में पारित कर दिया गया है जिसमें उन्हें पेश किया गया था। यह आंकड़ा संसदीय इतिहास में विधायी दक्षता के एक नए स्तर को दर्शाता है, हालांकि कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इतनी तेजी से कानून पारित करने से विधेयकों की विस्तृत जांच और बहस के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता है। शुरुआत में, 18वीं लोकसभा की गति धीमी थी, लेकिन पिछले वर्ष में इसमें तेजी आई है, जो सरकार की विधायी प्राथमिकताओं और सदन के भीतर कामकाज के तरीके में एक बदलाव का संकेत देता है। यह गति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दर्शाता है कि सरकार महत्वपूर्ण कानूनों को तेजी से अधिनियमित करने का प्रयास कर रही है।
सत्र-वार विश्लेषण और महत्वपूर्ण मामले
विधेयकों को पारित करने की गति का सत्र-वार विश्लेषण दिलचस्प रुझान दिखाता है। 2026 के बजट सत्र के दौरान, पेश किए गए 10 विधेयकों में से 5 को उसी सत्र में दोनों सदनों द्वारा पारित कर दिया गया था। हालांकि, गति में वास्तविक उछाल हाल ही में समाप्त हुए मानसून सत्र में देखा गया, जो 13 अगस्त को समाप्त हुआ। इस सत्र में पेश किए गए 12 विधेयकों में से 11 को सत्र समाप्त होने से पहले ही मंजूरी मिल गई थी। यह आंकड़ा अत्यधिक उच्च पारित दर को दर्शाता है, जो संसदीय कामकाज की बदलती प्रकृति पर प्रकाश डालता है। केवल एक विधेयक, द इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट बिल, 2026, मानसून सत्र के अंत तक लंबित रहा। यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है क्योंकि यह दर्शाता है कि अधिकांश विधायी कार्य अत्यधिक संपीड़ित समय-सीमा के भीतर पूरे किए गए, जिससे सांसदों और विशेषज्ञों को प्रत्येक विधेयक के प्रावधानों पर गहन विचार-विमर्श करने का अवसर सीमित हो गया। आम तौर पर, विधेयकों को जांच के लिए स्थायी समितियों के पास भेजा जाता है, लेकिन इतनी तीव्र गति से पारित होने पर यह प्रक्रिया अक्सर बाधित होती दिख रही है।
एजेंडा से बाहर के विधेयक और लंबित मुद्दे
मानसून सत्र के दौरान पारित किए गए विधेयकों के विश्लेषण से एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। सरकार के मूल विधायी एजेंडा में पांच नए विधेयकों को पेश करने और पारित करने तथा दो लंबित विधेयकों पर विचार करने और पारित करने की सूची थी। हालांकि, मानसून सत्र के दौरान अंततः पारित हुए 11 विधेयकों में से छह मूल एजेंडा में शामिल नहीं थे। इसका मतलब है कि अंतिम समय में कई महत्वपूर्ण विधेयक जोड़े गए और उन्हें तेजी से पारित किया गया, जिससे विपक्ष और अन्य हितधारकों को उन पर पर्याप्त प्रतिक्रिया देने का समय नहीं मिला। इसके अतिरिक्त, एजेंडा में सूचीबद्ध दो लंबित विधेयक – विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (वीबीएसए) विधेयक, 2025 और विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन (एफसीआरए) विधेयक, 2026 – पारित नहीं हो पाए। वीबीएसए विधेयक की जांच कर रही संसदीय समिति ने अभी तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की है, जबकि एफसीआरए संशोधन विधेयक को एक संयुक्त समिति के पास भेजा गया था। यह स्थिति दर्शाती है कि कुछ विधेयक, जिन पर अधिक जांच की आवश्यकता होती है, वे लंबित रहते हैं, जबकि अन्य, जो मूल एजेंडा में नहीं होते हैं, उन्हें तेजी से आगे बढ़ाया जाता है। यह कार्यप्रणाली संसदीय प्रक्रिया की भविष्यवाणी और पारदर्शिता पर सवाल उठाती है, क्योंकि एजेंडा से बाहर के विधेयकों का इतनी जल्दी पारित होना अक्सर विस्तृत सार्वजनिक जांच से बच सकता है। यह प्रवृत्ति विधायी प्रक्रिया में एक नए मानदंड की ओर इशारा करती है, जहां गति और दक्षता को कभी-कभी गहन जांच और व्यापक बहस पर प्राथमिकता दी जा सकती है।