जापान से बागेश्वर बाबा का संदेश: राष्ट्रवाद पर जातिवाद हावी
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हाल ही में अपने जापान प्रवास के दौरान, बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री, जिन्हें लोकप्रिय रूप से बागेश्वर बाबा के नाम से जाना जाता है, ने भारत में व्याप्त जातिवाद पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने जापान की राष्ट्र-प्रथम भावना की सराहना करते हुए भारत को आत्मनिरीक्षण करने का 'आईना' दिखाया। धीरेंद्र शास्त्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जहां जापान में "जातिवाद नहीं देश पहले" की भावना है, वहीं भारत में "राष्ट्रिजम नहीं कास्टिजम पहले" की मानसिकता अधिक प्रचलित है। उनकी यह टिप्पणी भारतीय समाज में गहरे बैठे जातिगत विभाजन और उसके राष्ट्र निर्माण पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों पर एक महत्वपूर्ण बहस छेड़ती है। उन्होंने भारतीय समाज को जातिवाद की बेड़ियों से मुक्त होकर सच्ची राष्ट्रीय भावना के साथ राष्ट्र निर्माण में जुट जाने का आह्वान किया।
जापान से भारत को 'आईना'
धीरेंद्र शास्त्री ने जापान के लोगों की जिस भावना की प्रशंसा की, वह उनके देश प्रेम और राष्ट्रीय एकता के प्रति अटूट समर्पण को दर्शाती है। उन्होंने बताया कि जापान में लोग अपनी जाति या क्षेत्रीय पहचान से ऊपर उठकर सबसे पहले स्वयं को जापानी मानते हैं, और देश उनके लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसके विपरीत, बाबा बागेश्वर ने भारत की स्थिति पर खेद व्यक्त करते हुए कहा कि यहां लोग अक्सर अपनी जातिगत पहचान को राष्ट्रीय पहचान से ऊपर रखते हैं। यह मानसिकता न केवल सामाजिक सौहार्द को बाधित करती है, बल्कि राष्ट्र की प्रगति और उसकी वैश्विक छवि पर भी नकारात्मक प्रभाव डालती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जब तक भारतीय समाज जातिवाद के दलदल से बाहर नहीं निकलता, तब तक सच्चे अर्थों में 'राष्ट्रवाद' की भावना स्थापित नहीं हो पाएगी। धीरेंद्र शास्त्री का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक मंचों पर जातिगत पहचान को लेकर बहस तेज हो रही है।
सामाजिक समरसता और राष्ट्र निर्माण की चुनौती
जातिवाद एक ऐसी सामाजिक बुराई है जो सदियों से भारत को जकड़े हुए है। यह समाज को खंडित करती है, असमानता को बढ़ावा देती है और व्यक्तियों के बीच खाई पैदा करती है। बागेश्वर बाबा ने अपनी टिप्पणी के माध्यम से इस गहरी जड़ें जमा चुकी समस्या को उजागर किया है और इसके दुष्परिणामों के प्रति आगाह किया है। उन्होंने कहा कि जब तक लोग अपनी जातिगत पहचान को अपनी राष्ट्रीय पहचान से ऊपर रखेंगे, तब तक भारत एक मजबूत और एकजुट राष्ट्र के रूप में अपनी पूरी क्षमता हासिल नहीं कर पाएगा। राष्ट्र निर्माण केवल आर्थिक विकास या सैन्य शक्ति से ही नहीं होता, बल्कि यह सामाजिक एकता, आपसी सम्मान और साझा राष्ट्रीय गौरव की भावना पर भी निर्भर करता है। जातिवाद इन सभी स्तंभों को कमजोर करता है। उनकी यह बात एक आध्यात्मिक गुरु के रूप में सामाजिक सुधार के प्रति उनके सरोकार को दर्शाती है, जो केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है बल्कि व्यापक सामाजिक परिवर्तन की वकालत करता है।
धीरेंद्र शास्त्री का बढ़ता वैश्विक प्रभाव
बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की लोकप्रियता भारत के बाहर भी तेजी से बढ़ रही है। जापान का उनका दौरा उनके बढ़ते वैश्विक प्रभाव का एक और उदाहरण है। विभिन्न देशों में उनके कार्यक्रमों और प्रवचनों में बड़ी संख्या में लोग शामिल हो रहे हैं, जो उनकी बातों को सुनने और समझने के लिए उत्सुक रहते हैं। जापान में दिए गए उनके इस बयान से पता चलता है कि वह केवल धार्मिक उपदेश ही नहीं देते, बल्कि सामाजिक मुद्दों पर भी अपनी बेबाक राय रखते हैं। एक आध्यात्मिक नेता के रूप में, वे अपने मंच का उपयोग सामाजिक चेतना जगाने और लोगों को सकारात्मक बदलाव के लिए प्रेरित करने हेतु कर रहे हैं। उनका मानना है कि धर्म का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत मुक्ति नहीं, बल्कि समाज का उत्थान और उसमें व्याप्त बुराइयों का निवारण भी है। धीरेंद्र शास्त्री की यह टिप्पणी भारतीय समाज को जातिवाद की चुनौतियों पर गंभीरता से विचार करने के लिए प्रेरित कर सकती है।
जातिवाद से मुक्ति की राह
धीरेंद्र शास्त्री के अनुसार, भारत को यदि वैश्विक मंच पर एक सशक्त राष्ट्र के रूप में उभरना है, तो उसे सबसे पहले अपनी आंतरिक कमजोरियों, विशेषकर जातिवाद, से मुक्ति पानी होगी। उन्होंने जापान का उदाहरण देकर यह बताने की कोशिश की कि कैसे एक राष्ट्र अपनी एकता और सामूहिक भावना के दम पर प्रगति कर सकता है। यह आवश्यक है कि शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और नेतृत्व के माध्यम से जातिगत भेदभाव को मिटाया जाए। बच्चों को बचपन से ही राष्ट्रीयता और समानता का पाठ पढ़ाया जाए। सामाजिक संगठनों और धार्मिक नेताओं को भी इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। धीरेंद्र शास्त्री की यह टिप्पणी केवल आलोचना नहीं है, बल्कि भारत को एक बेहतर, अधिक एकजुट और प्रगतिशील राष्ट्र बनाने की दिशा में एक आह्वान है। यह हमें याद दिलाता है कि असली राष्ट्रवाद व्यक्तिगत पहचान से ऊपर उठकर सामूहिक हित और देश के गौरव को प्राथमिकता देने में निहित है।
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