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पुरी में भव्य जगन्नाथ रथ यात्रा शुरू, पीएम मोदी ने दिया खास संदेश

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पुरी में भव्य जगन्नाथ रथ यात्रा शुरू, पीएम मोदी ने दिया खास संदेश
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ओडिशा के पुरी में विश्व प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा 16 जुलाई 2026 को पूरे विधि-विधान और अपार जनसमूह के साथ शुरू हो गई है। यह वार्षिक उत्सव भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा की गुंडिचा मंदिर तक की यात्रा का प्रतीक है। देश-विदेश से पहुंचे लाखों श्रद्धालु इस दिव्य और भव्य आयोजन के साक्षी बनने के लिए पुरी के ग्रैंड रोड पर उमड़ पड़े हैं। मंदिर प्रशासन ने रथ यात्रा को लेकर सभी धार्मिक अनुष्ठान सफलतापूर्वक पूरे कर लिए हैं, और सुरक्षा व्यवस्था के लिए 14 हजार से अधिक सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए हैं। इस पावन अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी देशवासियों को शुभकामनाएं दी हैं, जिससे इस महापर्व का महत्व और बढ़ गया है। यह यात्रा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि ओडिशा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का भी परिचायक है।

आस्था और उल्लास का अद्भुत संगम

जगन्नाथ रथ यात्रा का आरंभ होते ही पुरी का ग्रैंड रोड 'जय जगन्नाथ' के जयघोष से गूंज उठा। लाखों भक्तगण, जिनमें बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी शामिल थे, भगवान के दर्शन और रथ खींचने के सौभाग्य को प्राप्त करने के लिए आतुर दिखे। आध्यात्मिक ऊर्जा और अटूट विश्वास का यह संगम एक अविस्मरणीय दृश्य प्रस्तुत कर रहा था। तीनों भव्य रथ, भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष, भगवान बलभद्र का तालाध्वज और देवी सुभद्रा का दर्पदलन, पूरी तरह से सजकर तैयार थे। इन रथों को विभिन्न प्रकार के फूलों, वस्त्रों और पारंपरिक कलाकृतियों से बेहद आकर्षक ढंग से सजाया गया था। प्रत्येक रथ का निर्माण विशेष प्रकार की लकड़ी से किया जाता है और यह प्रक्रिया बसंत पंचमी से शुरू होती है, जो एक प्राचीन परंपरा का हिस्सा है। भक्तों का मानना है कि रथ खींचने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, और इसी आस्था के साथ वे भारी संख्या में इस पुण्य कार्य में सहभागिता करते हैं। यह यात्रा सांप्रदायिक सद्भाव और एकता का भी संदेश देती है, क्योंकि इसमें सभी जाति, धर्म और पंथ के लोग बिना किसी भेदभाव के शामिल होते हैं।

सुरक्षा के कड़े इंतजाम और गणमान्य व्यक्तियों के संदेश

इस विशाल धार्मिक आयोजन को शांतिपूर्ण और सुरक्षित ढंग से संपन्न कराने के लिए मंदिर प्रशासन और राज्य सरकार ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं। करीब 14 हजार सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया है, जिनमें एनएसजी, सीआरपीएफ, बीएसएफ और आरएएफ के जवान भी शामिल हैं। बहुस्तरीय सुरक्षा घेरा बनाया गया है, ताकि किसी भी अप्रिय घटना को रोका जा सके। भीड़ नियंत्रण और निगरानी के लिए ड्रोन और एंटी-ड्रोन सिस्टम का उपयोग किया जा रहा है, जिससे हवाई निगरानी सुनिश्चित की जा सके। इसके अतिरिक्त, सीसीटीवी कैमरों के माध्यम से भी पूरे मार्ग पर नजर रखी जा रही है। इस अवसर पर देश के सर्वोच्च नेताओं ने भी शुभकामनाएं प्रेषित कीं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने संदेश में देशवासियों के सुख-समृद्धि की कामना की, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे भक्ति, शांति और सद्भाव का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि यह यात्रा देश की सांस्कृतिक विविधता और एकता को दर्शाती है और सभी के जीवन में खुशहाली और कल्याण लाए।

रथ यात्रा का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व

भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा की परंपरा कई सदियों पुरानी है और इसका उल्लेख प्राचीन धर्मग्रंथों में भी मिलता है। यह यात्रा केवल एक धार्मिक जुलूस नहीं है, बल्कि ओडिशा की पहचान और गौरव का प्रतीक है। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा वर्ष में एक बार अपनी मौसी के घर, गुंडिचा मंदिर, जाते हैं, जहाँ वे सात दिनों तक निवास करते हैं। इस दौरान उनकी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। यह यात्रा दुनिया के सबसे बड़े और प्राचीन रथोत्सवों में से एक है, जो हर साल लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है। इसका वैश्विक महत्व भी है, क्योंकि यह पर्यटकों और शोधकर्ताओं को भी भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता का अनुभव करने का अवसर प्रदान करती है। रथों का निर्माण, देवताओं की साज-सज्जा, और अनुष्ठानों का पालन अत्यंत बारीकी और पारंपरिक नियमों के अनुसार किया जाता है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते रहे हैं। इस पर्व के माध्यम से कला, संगीत और साहित्य को भी बढ़ावा मिलता है, जो ओडिशा की समृद्ध विरासत का अभिन्न अंग हैं।

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भक्तों का उत्साह और आगामी अनुष्ठान

रथ यात्रा के दौरान भक्तों का उत्साह देखते ही बनता है। वे ढोल-नगाड़ों की थाप पर नाचते-गाते हुए भगवान की जयकार करते हैं। रथों को खींचने के लिए भक्तों में होड़ लगी रहती है, क्योंकि यह अत्यंत पवित्र कार्य माना जाता है। यात्रा के दौरान विभिन्न स्थानों पर आरतियां और प्रसाद वितरण किया जाता है। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा गुंडिचा मंदिर में सात दिनों तक निवास करेंगे, जिसके बाद आषाढ़ शुक्ल दशमी को बाहुड़ा यात्रा (वापसी यात्रा) होगी, जब तीनों रथ अपने मूल मंदिर, जगन्नाथ मंदिर, लौटेंगे। इस पूरी अवधि में विशेष पूजा-अर्चना और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। यह महापर्व सामाजिक समरसता और सामुदायिक भागीदारी का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ सभी भक्त मिलकर इस दिव्य उत्सव को सफल बनाने में योगदान देते हैं। रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि मनुष्यों को ईश्वर से जोड़ने वाला एक शक्तिशाली माध्यम है, जो प्रेम, करुणा और भक्ति के संदेश को प्रसारित करता है।

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