सेंसेक्स 900 अंक लुढ़का, निफ्टी 23,800 के नीचे: बाजार में भारी गिरावट
भारतीय शेयर बाजार शुक्रवार को लगातार पांचवें कारोबारी सत्र में गिरावट के साथ बंद हुआ, क्योंकि वैश्विक और घरेलू दोनों तरह के दबावों ने निवेशकों को चिंता में डाल दिया। मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने वाली कीमतें, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की लगातार बिकवाली और अमेरिकी व्यापार शुल्क से जुड़ी चिंताओं ने बाजार की धारणा को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स दिन के कारोबार में 916.96 अंक तक गिरकर 75,474.43 के निचले स्तर पर पहुंच गया था, और अंततः 331.62 अंक, या 0.43%, की गिरावट के साथ 76,059.77 पर बंद हुआ। इसी तरह, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का निफ्टी भी 102.15 अंक, या 0.43%, गिरकर 23,767.45 पर आ गया। यह गिरावट ऐसे समय में आई है जब निवेशक इन बाहरी कारकों के भारतीय अर्थव्यवस्था और कंपनियों पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का आकलन कर रहे हैं। जियोजित इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड के शोध प्रमुख, विनोद नायर ने कहा, "निकट भविष्य में बाजार की धारणा पर दबाव बने रहने की संभावना है, क्योंकि उच्च दायरे में बनी रहने वाली तेल की कीमतें प्रमुख मैक्रोइकॉनॉमिक संकेतकों और विकास की गतिशीलता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं।"
भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतें
मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने निवेशकों की चिंताओं को बढ़ा दिया है, जिससे कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। अमेरिका सेना ने गुरुवार को ईरान के खिलाफ लगातार 13वीं रात हवाई हमले किए, यह तब हुआ जब यमन के हौथी विद्रोहियों ने दावा किया कि उन्होंने लाल सागर में सऊदी के दो तेल टैंकरों पर हमला किया है। इस घटनाक्रम ने वैश्विक शिपिंग और ऊर्जा आपूर्ति में व्यापक व्यवधान की आशंकाओं को जन्म दिया है। हालांकि शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड 3.66% गिरकर 96.98 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया, लेकिन पिछले सत्र में यह 100 डॉलर प्रति बैरल का आंकड़ा पार कर चुका था, जिससे मुद्रास्फीति और आर्थिक विकास को लेकर चिंताएं बरकरार रहीं। तेल की कीमतों में वृद्धि सीधे तौर पर भारत जैसे तेल आयातक देशों को प्रभावित करती है, क्योंकि इससे आयात बिल बढ़ता है और देश में ईंधन की कीमतें बढ़ने से मुद्रास्फीति का दबाव पैदा होता है।
अमेरिकी व्यापार शुल्क और वैश्विक व्यापार पर प्रभाव
अमेरिकी व्यापार शुल्क को लेकर नई चिंताओं ने भी निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया। बाजार के प्रतिभागियों ने वैश्विक व्यापार और निर्यात-उन्मुख क्षेत्रों पर इनके संभावित प्रभाव का आकलन किया। ट्रंप प्रशासन द्वारा घोषित एक नए टैरिफ शासन के तहत, भारत को संयुक्त राज्य अमेरिका को निर्यात पर 10% टैरिफ का सामना करना पड़ेगा। यह तब हुआ जब हालिया नीतिगत परिवर्तनों के बाद भारत कम दर के लिए योग्य हो गया था। अमेरिका ने 60 अर्थव्यवस्थाओं से आयात पर 10% और 12.5% के नए टैरिफ लगाए हैं, यह कहते हुए कि इस कदम का उद्देश्य व्यापारिक भागीदारों को जबरन श्रम का उपयोग करके उत्पादित वस्तुओं के खिलाफ प्रवर्तन को मजबूत करने के लिए प्रोत्साहित करना है। विनोद नायर ने आगे कहा, "वॉशिंगटन के नए आयात शुल्क ने निर्यात-संचालित अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक और चुनौती खड़ी कर दी है, जिसमें प्रौद्योगिकी-भारी बाजार सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं क्योंकि उच्च दरें विकास पर दबाव डालती हैं और निवेशक तेजी से अन्य उभरते बाजार के अवसरों के लिए अपने केंद्रित जोखिम को विविधता प्रदान करने की तलाश में हैं।"
FII बिकवाली और कमजोर वैश्विक संकेत
विदेशी फंडों का बहिर्प्रवाह बाजार पर दबाव बनाए हुए है। एक्सचेंज के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने गुरुवार को 2,999.23 करोड़ रुपये की इक्विटी बेची, जिससे विदेशी बिकवाली का हालिया रुझान जारी रहा। विदेशी मुद्रा व्यापारियों ने भी FII बहिर्प्रवाह को रुपये पर दबाव डालने वाले कारकों में से एक बताया, साथ ही उच्च कच्चे तेल की कीमतें और भू-राजनीतिक तनाव भी इसके कारण थे। एशियाई बाजारों में कमजोरी ने जोखिम-रहित धारणा को और मजबूत किया। दक्षिण कोरिया का KOSPI 5.72% गिर गया, जबकि जापान का निक्केई 225, शंघाई का SSE कंपोजिट और हांगकांग का हैंग सेंग भी निचले स्तर पर बंद हुए। अमेरिकी बाजार भी रात भर लाल निशान में समाप्त हुए थे, हालांकि यूरोपीय बाजार ऊपर कारोबार कर रहे थे। इन वैश्विक संकेतों ने भारतीय बाजार में नकारात्मकता को बढ़ावा दिया।
निकट भविष्य की चुनौतियाँ और बाजार का दृष्टिकोण
मौजूदा बाजार गिरावट कई परस्पर संबंधित कारकों का परिणाम है जो वैश्विक और घरेलू दोनों मोर्चों पर अनिश्चितता पैदा कर रहे हैं। मध्य पूर्व में लगातार बढ़ते तनाव से कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता बनी रहने की संभावना है, जिससे वैश्विक मुद्रास्फीति और आर्थिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसके अलावा, नए अमेरिकी व्यापार शुल्क भारत जैसे निर्यात-उन्मुख देशों के लिए एक अतिरिक्त चुनौती पेश करते हैं, विशेष रूप से प्रौद्योगिकी और अन्य प्रमुख निर्यात क्षेत्रों को प्रभावित करते हुए। FIIs की लगातार बिकवाली और कमजोर वैश्विक बाजार संकेत भी निवेशकों की भावनाओं को कमजोर कर रहे हैं। बाजार विशेषज्ञ विनोद नायर के अनुसार, जब तक तेल की कीमतें उच्च स्तर पर बनी रहती हैं, तब तक बाजार की धारणा पर दबाव बने रहने की संभावना है, जो व्यापक आर्थिक संकेतकों और विकास की गतिशीलता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकती है। निवेशकों को निकट भविष्य में सतर्क रहने और वैश्विक घटनाक्रमों पर बारीकी से नजर रखने की सलाह दी जाती है।
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