बस्तर दशहरा 2026: 75 दिनी ऐतिहासिक पर्व की आज से शुरुआत
आज से छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में 75 दिवसीय विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व 2026 का औपचारिक शुभारम्भ हो गया है। यह ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध उत्सव पारंपरिक पाट जात्रा पूजा के साथ शुरू हुआ, जिसमें सर्वप्रथम वृक्ष की पूजा कर अनुष्ठानों की श्रृंखला का आगाज किया जाता है। यह पर्व भारतीय उपमहाद्वीप में मनाए जाने वाले सामान्य दशहरे से बिल्कुल भिन्न है, क्योंकि इसमें भगवान राम की विजयगाथा के बजाय स्थानीय देवी-देवताओं, विशेषकर आराध्य देवी माँ दंतेश्वरी और अन्य ग्राम देवों की आराधना की जाती है। यह आयोजन बस्तर की अद्वितीय आदिवासी संस्कृति, परम्पराओं और जीवनशैली का जीवंत प्रदर्शन है, जो आने वाले ढाई महीने तक पूरे क्षेत्र को भक्ति और उत्साह के रंग में रंग देगा।
पाट जात्रा पूजा: पर्व का शुभ आरम्भ
बस्तर दशहरा की पहली और सबसे महत्वपूर्ण रस्म पाट जात्रा पूजा है, जो हर साल श्रावण अमावस्या के दिन संपन्न होती है। यह अनुष्ठान प्रकृति की पूजा और उससे अनुमति लेने की प्राचीन आदिवासी परंपरा को दर्शाता है। इस पूजा में सबसे पहले तूम्बा नामक ग्राम में एक विशेष सागौन वृक्ष की पहचान की जाती है, जिसे दशहरे के लिए बनने वाले विशालकाय रथ के निर्माण में उपयोग किया जाना है। इस वृक्ष की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है, जिसमें स्थानीय पुजारी और बस्तर राजपरिवार के सदस्य शामिल होते हैं। इसके बाद एक बकरे की बलि देकर देवी-देवताओं को प्रसन्न किया जाता है और रथ निर्माण के लिए लकड़ी काटने की अनुमति मांगी जाती है। यह रस्म पर्व का आध्यात्मिक आधार तय करती है।
75 दिनी बस्तर दशहरा: एक अद्वितीय परंपरा
भारत के अन्य हिस्सों में दशहरा जहां 10 दिनों तक मनाया जाता है, वहीं बस्तर का दशहरा 75 दिनों तक चलने वाला एक अनूठा और विश्व का सबसे लंबा पर्व है। इसकी शुरुआत लगभग 600 वर्ष पूर्व काकतीय राजवंश के महाराजा पुरुषोत्तम देव द्वारा की गई थी, जब उन्होंने इसे अपनी आराध्य देवी माँ दंतेश्वरी के सम्मान में शुरू करने का निश्चय किया। इस पर्व में रामलीला का मंचन नहीं होता, बल्कि स्थानीय देवी-देवताओं, ग्राम देवों और शक्तिपीठों की पूजा की जाती है। यह पर्व बस्तर के मुरिया, भतरा, धुरवा, हल्बा सहित विभिन्न आदिवासी समुदायों के समन्वय और आस्था का प्रतीक है। 75 दिनों की यह अवधि विभिन्न अनुष्ठानों, देवी-देवताओं की यात्राओं और सामुदायिक मिलन के अवसरों से भरी होती है।
प्रमुख रस्में और अनुष्ठान
बस्तर दशहरा के 75 दिनों के दौरान कई महत्वपूर्ण और जटिल रस्में निभाई जाती हैं। पाट जात्रा के बाद, रथ निर्माण की प्रक्रिया शुरू होती है। काछन गादी में एक युवा कन्या को देवी काछन देवी के रूप में प्रतिष्ठित कर उससे पर्व को निर्विघ्न संपन्न कराने की अनुमति ली जाती है। जोगी बिठाई रस्म में एक जोगी को 9 दिनों के लिए जमीन में गड़ाकर तपस्या कराई जाती है ताकि पर्व में कोई बाधा न आए। मावली परघाव में दंतेवाड़ से माँ दंतेश्वरी की छत्र और डोली को सम्मानपूर्वक बस्तर लाया जाता है। जगदलपुर में होने वाली रथ यात्रा भी दो चरणों में होती है - भीतर रैनी और बाहर रैनी, जिसमें देवी की प्रतिमा को विशालकाय रथ पर बिठाकर नगर भ्रमण कराया जाता है। अंत में मुरिया दरबार और ओड़ी परघाव जैसी रस्में होती हैं।
सांस्कृतिक महत्व और पर्यटन
बस्तर दशहरा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यह बस्तर की आदिवासी संस्कृति, कला और परंपराओं का एक महाकुंभ है। यह पर्व स्थानीय लोगों के लिए अपनी पहचान और विरासत को बनाए रखने का सशक्त माध्यम है। विभिन्न आदिवासी समुदाय अपनी पारंपरिक वेशभूषा, लोकनृत्य और संगीत के साथ उत्सव में भाग लेते हैं। यह त्योहार बस्तर की प्राचीन शिल्प कला, जैसे कि लकड़ी पर नक्काशी और धातु कला को भी प्रदर्शित करता है। पर्यटन के दृष्टिकोण से भी बस्तर दशहरा का महत्व बढ़ रहा है। हर साल देश-विदेश से हजारों पर्यटक और शोधार्थी इस
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