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कायमगंज में छत्तीसगढ़ की मासूम का हैरतअंगेज करतब, परिवार का सहारा

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कायमगंज में छत्तीसगढ़ की मासूम का हैरतअंगेज करतब, परिवार का सहारा
छत्तीसगढ़

उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के कायमगंज कस्बे में हाल ही में एक मार्मिक दृश्य ने राहगीरों का ध्यान अपनी ओर खींचा। छत्तीसगढ़ से आई एक लगभग आठ से दस साल की मासूम बच्ची सड़क किनारे हैरतअंगेज करतब दिखा रही थी। यह बच्ची, जिसका नाम अभी अज्ञात है, अपने परिवार का पेट पालने के लिए यह जोखिम भरा काम कर रही थी। गरीबी और जीवनयापन की मजबूरी ने इस कम उम्र की बालिका को शिक्षा और खेलकूद की उम्र में सड़क पर संतुलन और कलाबाजी का प्रदर्शन करने को विवश कर दिया है, जिससे उसके परिवार को दो वक्त की रोटी मिल सके। यह दृश्य न केवल बाल श्रम की कड़वी सच्चाई को उजागर करता है, बल्कि देश के कई हिस्सों में खानाबदोश समुदायों के सामने आने वाली गंभीर चुनौतियों को भी दर्शाता है।

मजबूरी का हैरतअंगेज करतब

यह छोटी कलाकार अपनी उम्र से कहीं ज्यादा परिपक्वता और एकाग्रता के साथ अपने करतबों को अंजाम दे रही थी। उसने एक पतली रस्सी पर बिना किसी सहारे के चलकर दिखाया, वहीं बांस की लंबी सी डंडी के सहारे अपने शरीर का संतुलन बनाए रखकर दर्शकों को अचंभित कर दिया। उसके पिता बगल में ढोलक बजा रहे थे और माँ आस-पास खड़े लोगों से पैसे इकट्ठा कर रही थी। इस पूरे परिवार की जीविका इन्हीं जोखिम भरे करतबों पर निर्भर करती है। हर सफल करतब के बाद, बच्ची की आँखों में क्षणिक खुशी दिखती थी, जो शायद इस बात की तसल्ली थी कि आज रात का भोजन सुरक्षित हो गया है। कायमगंज की व्यस्त सड़कों पर, जहाँ लोग अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त रहते हैं, इस बच्ची का प्रदर्शन पल भर के लिए ठहरने और सोचने पर मजबूर कर देता है कि आखिर क्यों एक बच्चे को इतनी कम उम्र में इतना बड़ा जोखिम उठाना पड़ रहा है। यह दृश्य दिल को छू लेने वाला और चिंताजनक दोनों है, क्योंकि यह समाज के उस हिस्से की कड़वी हकीकत बयां करता है, जो अभी भी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है।

खानाबदोश जीवन और अनवरत संघर्ष

यह परिवार छत्तीसगढ़ के किसी दूरदराज इलाके से आता है, और बेहतर जीवन की तलाश में एक शहर से दूसरे शहर भटकता रहता है। ऐसे खानाबदोश समुदायों के लिए स्थिर आय का स्रोत खोजना लगभग असंभव होता है। इनके पास न तो कोई स्थायी पता होता है और न ही कोई निश्चित काम। ऐसे में, बच्चों द्वारा दिखाए जाने वाले करतब ही अक्सर इनकी आय का एकमात्र जरिया बनते हैं। परिवार के मुखिया, बच्ची के पिता ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि उनके पास कोई अन्य विकल्प नहीं है। खेती-बाड़ी के लिए जमीन नहीं है, और शहर में अकुशल मजदूरों के लिए काम की कमी है। उन्होंने यह भी बताया कि प्रशासन की ओर से उन्हें कोई मदद नहीं मिलती, जिससे वे अपने बच्चों को स्कूल भेज सकें या कोई और काम कर सकें। यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही मजबूरी है, जहाँ बच्चे अपने माता-पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए इसी तरह के करतबों को सीखते और प्रदर्शित करते हैं। इस असुरक्षित और अस्थिर जीवनशैली के कारण इन बच्चों का भविष्य हमेशा अंधकारमय रहता है, क्योंकि वे कभी भी शिक्षा और स्वस्थ बचपन का अनुभव नहीं कर पाते।

बाल श्रम और सामाजिक जिम्मेदारी

यह घटना बाल श्रम का एक स्पष्ट उदाहरण है, जो भारतीय कानून के तहत प्रतिबंधित है। 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से काम करवाना एक अपराध है, खासकर ऐसे जोखिम भरे काम। इस बच्ची का सड़क पर करतब दिखाना न केवल उसके शारीरिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है, बल्कि उसके मानसिक और भावनात्मक विकास पर भी गहरा नकारात्मक प्रभाव डालता है। उसे शिक्षा और सुरक्षित बचपन से वंचित किया जा रहा है, जो हर बच्चे का मौलिक अधिकार है। स्थानीय प्रशासन और बाल कल्याण संगठनों को ऐसे मामलों में तत्काल हस्तक्षेप करने की आवश्यकता है। मात्र पैसे देकर आगे बढ़ जाना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। ऐसे परिवारों की पहचान कर उन्हें आर्थिक सहायता, बच्चों को शिक्षा और पुनर्वास की व्यवस्था करना अत्यंत आवश्यक है। यह सुनिश्चित करना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है कि कोई भी बच्चा गरीबी या मजबूरी के कारण अपने बचपन को दांव पर न लगाए। कायमगंज में दिखा यह दृश्य एक वेक-अप कॉल है, जो हमें याद दिलाता है कि अभी भी हमारे समाज में कितनी असमानताएं और चुनौतियां मौजूद हैं, जिनके समाधान के लिए ठोस और दीर्घकालिक प्रयासों की आवश्यकता है।

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