रसूलपुर में टीबी मुक्त अभियान: 70 की जांच, 5 संदिग्ध सीएचसी रेफर
उत्तर प्रदेश के रसूलपुर गाँव में रविवार, 12 मई, 2024 को 'टीबी मुक्त भारत अभियान' के तहत एक वृहद स्वास्थ्य शिविर का आयोजन किया गया। इस शिविर का मुख्य उद्देश्य क्षय रोग (टीबी) की प्रारंभिक पहचान, रोकथाम और समुदाय में जागरूकता बढ़ाना था। स्थानीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) और स्वास्थ्य विभाग के समन्वय से आयोजित इस शिविर में गाँव के 70 ग्रामीणों की स्वास्थ्य जांच की गई, जिनमें से 5 संदिग्ध मरीजों को आगे की विस्तृत जांच और आवश्यक उपचार के लिए तत्काल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रेफर किया गया। यह पहल भारत सरकार के महत्वाकांक्षी लक्ष्य, वर्ष 2025 तक देश से टीबी का उन्मूलन करने, की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
टीबी मुक्त भारत अभियान का विस्तृत परिप्रेक्ष्य
'टीबी मुक्त भारत अभियान' प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किया गया एक राष्ट्रीय कार्यक्रम है, जिसका लक्ष्य भारत को वैश्विक टीबी उन्मूलन लक्ष्य से पाँच साल पहले, यानी 2025 तक, टीबी से मुक्त करना है। यह अभियान केवल दवा वितरण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें जनभागीदारी, पोषण संबंधी सहायता, प्रारंभिक निदान और व्यापक जागरूकता कार्यक्रमों पर भी जोर दिया गया है। रसूलपुर में आयोजित यह शिविर इसी बड़े अभियान का एक हिस्सा था, जहाँ स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं को लोगों के घर-द्वार तक पहुँचाने का प्रयास किया गया। अभियान के तहत, टीबी रोगियों को निक्षय पोषण योजना के तहत मासिक वित्तीय सहायता भी प्रदान की जाती है, ताकि वे उपचार के दौरान अपनी पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा कर सकें। इस कार्यक्रम में स्वास्थ्य कर्मियों के साथ-साथ स्वयंसेवी संस्थाओं और जन प्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी भी सुनिश्चित की जाती है, ताकि अभियान को जमीनी स्तर पर सफलता मिल सके।
शिविर में जांच प्रक्रिया और उपलब्ध सुविधाएँ
रसूलपुर के प्राथमिक विद्यालय परिसर में आयोजित इस स्वास्थ्य शिविर में ग्रामीणों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। शिविर में सुबह 9 बजे से दोपहर 2 बजे तक स्वास्थ्य जांच की गई। सबसे पहले, एक पंजीकरण डेस्क स्थापित किया गया था जहाँ प्रत्येक व्यक्ति का नाम, पता और संपर्क विवरण दर्ज किया गया। इसके बाद, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी डॉ. अमित कुमार के नेतृत्व में एक 5 सदस्यीय चिकित्सीय दल ने लोगों की जांच की। इस दल में दो एमबीबीएस डॉक्टर, एक लैब टेक्नीशियन और दो पैरामेडिकल स्टाफ शामिल थे। जांच प्रक्रिया में रक्तचाप मापना, मधुमेह की प्रारंभिक जांच, सामान्य शारीरिक परीक्षण और सबसे महत्वपूर्ण, टीबी के लक्षणों जैसे लगातार खांसी, बुखार, वजन घटना और रात में पसीना आने के बारे में पूछताछ शामिल थी। जिन लोगों में टीबी के कोई भी संदिग्ध लक्षण पाए गए, उनके बलगम के नमूने एकत्र किए गए। शिविर में स्वच्छता और सामाजिक दूरी के नियमों का भी कड़ाई से पालन किया गया। ग्रामीणों को टीबी से बचाव, इसके लक्षणों और उपचार के बारे में जानकारी देने वाले हिंदी में छपे पर्चे भी वितरित किए गए, जिससे जागरूकता फैलाने में मदद मिली।
रेफर किए गए मरीजों का आगे का उपचार और निगरानी
शिविर में जांच के दौरान, 70 लोगों में से 5 व्यक्तियों में टीबी के प्राथमिक लक्षण या संदेहजनक स्थितियां पाई गईं। इन सभी 5 संदिग्ध मरीजों को तुरंत सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) रसूलपुर रेफर किया गया। डॉ. अमित कुमार ने बताया कि सीएचसी में इन मरीजों की और भी गहन जांच की जाएगी, जिसमें एक्स-रे, बलगम की माइक्रोस्कोपी और आवश्यकता पड़ने पर सीबीएनएएटी (Cartridge-based Nucleic Acid Amplification Test) जैसी अत्याधुनिक जांचें शामिल होंगी। यदि टीबी की पुष्टि होती है, तो इन मरीजों को सरकार द्वारा निःशुल्क दवाएं और उपचार प्रदान किया जाएगा। इसके साथ ही, उन्हें 'निक्षय पोषण योजना' के तहत प्रत्येक माह ₹500 की वित्तीय सहायता भी दी जाएगी, ताकि वे उपचार के दौरान पौष्टिक आहार ले सकें। स्वास्थ्य विभाग इन मरीजों की नियमित निगरानी करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि वे दवा का पूरा कोर्स लें, क्योंकि अधूरा उपचार टीबी को और गंभीर बना सकता है और मल्टी-ड्रग रेसिस्टेंट टीबी (MDR-TB) का खतरा बढ़ा सकता है।
भविष्य की योजनाएं और जनभागीदारी का आह्वान
स्थानीय ग्राम पंचायत के सरपंच श्री रामेश्वर दयाल ने इस पहल की सराहना की और कहा कि ऐसे स्वास्थ्य शिविरों से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच बढ़ती है। उन्होंने ग्रामीणों से भी अपील की कि वे अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहें और किसी भी संदिग्ध लक्षण को नजरअंदाज न करें। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. राजेश गुप्ता ने बताया कि रसूलपुर जैसे शिविरों का आयोजन जिले के अन्य ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में भी किया जाएगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि टीबी उन्मूलन केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है, बल्कि इसमें प्रत्येक नागरिक की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। स्वास्थ्य विभाग आगामी महीनों में स्कूल-आधारित जागरूकता कार्यक्रमों और स्थानीय स्वयं सहायता समूहों के साथ मिलकर टीबी के बारे में अधिक जानकारी फैलाने की योजना बना रहा है। लक्ष्य यह है कि ग्राम स्तर पर स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया जाए ताकि वे टीबी के लक्षणों को पहचान सकें और समय पर मरीजों को जांच के लिए प्रेरित कर सकें, जिससे भारत को 2025 तक टीबी मुक्त बनाने का सपना साकार हो सके।
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