ONGC का रणनीतिक गैस भंडार, ईरान युद्ध के बीच ऊर्जा सुरक्षा की पहल
सार्वजनिक क्षेत्र की तेल और प्राकृतिक गैस निगम लिमिटेड (ONGC) भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठा रहा है। कंपनी पश्चिमी भारत में अपने गैस-उत्पादन स्थलों के पास देश का पहला रणनीतिक प्राकृतिक गैस भंडार बनाने की योजना बना रही है। यह विकास ऐसे समय में हुआ है जब पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को बाधित कर दिया है, जिससे भारत की 55% प्राकृतिक गैस आवश्यकताओं के लिए आयात पर निर्भरता उजागर हुई है, जिसका वार्षिक मूल्य लगभग 15 अरब डॉलर है। इस पहल का उद्देश्य भविष्य के ऐसे संकटों के प्रभाव को कम करना है। इससे पहले, भूमिगत नमक गुफाओं में प्राकृतिक गैस के भंडारण की केंद्र सरकार की योजना उच्च पूंजीगत व्यय और तकनीकी जटिलताओं के कारण सफल नहीं हो पाई थी।
रणनीतिक गैस भंडार की आवश्यकता और पृष्ठभूमि
भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, और इसकी ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है। प्राकृतिक गैस स्वच्छ ऊर्जा का एक महत्वपूर्ण स्रोत है और बिजली उत्पादन, उर्वरक उत्पादन, परिवहन और औद्योगिक उपयोग जैसे विभिन्न क्षेत्रों में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। वर्तमान में, भारत अपनी प्राकृतिक गैस की लगभग आधी से अधिक आवश्यकताओं के लिए आयात पर निर्भर है, जिससे यह वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधानों के प्रति संवेदनशील हो जाता है। ईरान युद्ध जैसे संकट वैश्विक ऊर्जा बाजारों में अनिश्चितता पैदा करते हैं और कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव ला सकते हैं, जिससे देश की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ता है।
इस पृष्ठभूमि में, रणनीतिक प्राकृतिक गैस भंडार की स्थापना भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह भंडार आपात स्थिति में देश को गैस की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करने में मदद करेगा, जिससे आर्थिक स्थिरता बनी रहेगी और उद्योगों को निर्बाध रूप से कार्य करने में सहायता मिलेगी। ONGC का यह कदम कंपनी द्वारा हाल ही में 1.75 मिलियन टन (mt) की रणनीतिक कच्चे तेल भंडारण सुविधा के निर्माण की घोषणा के बाद आया है, जबकि भारत के पास पहले से ही 5.2 mt का रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार है। यह स्पष्ट संकेत देता है कि भारत अपनी समग्र ऊर्जा सुरक्षा रणनीति को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है।
भंडारण विकल्पों पर गहन विचार
ONGC की योजना में शुरुआत में एक पायलट परियोजना के साथ आगे बढ़ने का विचार है। इस संबंध में, व्यवहार्यता सर्वेक्षण करना और क्षय हो चुके गैस कुओं (depleted gas wells) में एक भंडार या भंडारण सुविधा विकसित करना प्रमुख विकल्प है। इन कुओं का चयन इसलिए किया जा रहा है क्योंकि वे पहले से ही प्राकृतिक गैस के दबाव को संभालने के लिए तैयार हैं और उनकी भूगर्भीय संरचना इसके लिए उपयुक्त है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह विकल्प नमक गुफाओं की तुलना में काफी कम पूंजीगत व्यय (capex) और तकनीकी जटिलता वाला है, जिससे परियोजना को तेजी से और अधिक लागत प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकता है।
नमक गुफाओं और क्षय हो चुके गैस कुओं के अलावा, प्राकृतिक गैस भंडारण के लिए जलभृत (aquifers) भी एक और विकल्प है। जलभृत गहरी, जल-युक्त, छिद्रपूर्ण चट्टान संरचनाएं होती हैं जिन्हें उच्च दबाव पर गैस इंजेक्ट करके कृत्रिम भूमिगत गैस भंडार में परिवर्तित किया जा सकता है, जिससे पानी बाहर निकल जाता है और गैस एक अभेद्य कैप रॉक के नीचे सुरक्षित रूप से फंस जाती है। इसके अतिरिक्त, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस नियामक बोर्ड (PNGRB) देश में तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) टर्मिनलों के पास सतही भंडारण टैंक स्थापित करने के प्रस्ताव पर भी विचार कर रहा है।
विशेषज्ञ राय और भावी रणनीति
इंडियन गैस एक्सचेंज के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी राजेश मेदिरात्ता ने सुझाव दिया है कि ऐसे रणनीतिक भंडारों की योजना बनाते समय, उनके एक हिस्से को वाणिज्यिक उपयोग के लिए भी आरक्षित किया जाना चाहिए। उनका कहना है, "मान लीजिए कि भंडार 5 अरब घन मीटर (BCM) का है। इसमें से लगभग 2 BCM का उपयोग एक वाणिज्यिक मॉडल के तहत किया जा सकता है जिसे आसानी से व्यापार और फिर से भरा जा सकता है, और बाकी को आपातकालीन स्थिति में केवल रणनीतिक उपयोग के लिए रखा जाना चाहिए।" वह आगे कहते हैं कि यह यूरोप में देखे गए एक कार्यात्मक राजस्व मॉडल को विकसित करेगा। राजेश मेदिरात्ता के अनुसार, प्राकृतिक गैस भंडारण के लिए पहली प्राथमिकता हमेशा क्षय हो चुके गैस क्षेत्र होने चाहिए, क्योंकि आवश्यक बुनियादी ढांचा पहले से मौजूद है और पूंजीगत व्यय नमक गुफाओं की तुलना में बहुत कम है।
पीडब्ल्यूसी इंडिया में तेल और गैस के पार्टनर और लीडर मनस मजूमदार ने भी इस पहल का समर्थन करते हुए कहा, "भारत के लिए ऐसे रणनीतिक गैस भंडार विकसित करना समय की मांग है। चीन, अमेरिका, जर्मनी और पूरे यूरोप सहित कई देशों ने इस तरह के दीर्घकालिक भंडारण बुनियादी ढांचे के मामले में मिसाल कायम की है।" उन्होंने यह भी नोट किया कि हालांकि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपने तेल आयात में विविधता लाई है, वैश्विक स्तर पर सीमित बड़े स्रोतों को देखते हुए LNG आयात को उतनी आक्रामक रूप से विविधता नहीं दी जा सकती है। वर्तमान में, अमेरिका और अंगोला प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में से हैं। इस प्रकार, ONGC की यह परियोजना भारत की ऊर्जा सुरक्षा को एक नई दिशा देने और वैश्विक ऊर्जा झटकों के प्रति इसकी लचीलापन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
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