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जनवरी-मार्च 2026 में बेरोजगारी दर 5% पर: शहरी क्षेत्रों में गिरावट, ग्रामीण में वृद्धि

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जनवरी-मार्च 2026 में बेरोजगारी दर 5% पर: शहरी क्षेत्रों में गिरावट, ग्रामीण में वृद्धि
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राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा सोमवार को जारी आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में जनवरी-मार्च 2026 तिमाही के लिए मुख्य बेरोजगारी दर 5% दर्ज की गई है। इन आंकड़ों में शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी दर 6.6% और ग्रामीण क्षेत्रों में 4.3% रही। यह रिपोर्ट देश के श्रम बाजार की वर्तमान स्थिति को दर्शाती है, हालांकि, मौसमी कारकों के कारण पिछले वर्षों के साथ सीधी तुलना संभव नहीं है क्योंकि NSO ने अप्रैल-जून 2025 से तिमाही अनुमानों की नई श्रृंखला शुरू की है। यह नया डेटा श्रमबल की भागीदारी और रोजगार की गुणवत्ता में कुछ महत्वपूर्ण बदलावों को इंगित करता है।

बेरोजगारी दर में उतार-चढ़ाव

इस तिमाही में समग्र बेरोजगारी दर में पिछली तिमाही अक्टूबर-दिसंबर 2025 की तुलना में थोड़ी वृद्धि देखी गई है। समग्र बेरोजगारी दर में 20 आधार अंकों की वृद्धि हुई है, जो पिछली तिमाही से अधिक है। यह वृद्धि मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के कारण हुई है, जहाँ बेरोजगारी दर में 30 आधार अंकों की बढ़ोतरी दर्ज की गई और यह 4.3% पर पहुँच गई। इसके विपरीत, शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी दर में गिरावट आई है। शहरी बेरोजगारी दर 10 आधार अंकों की कमी के साथ 6.6% हो गई है। यह उतार-चढ़ाव विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार की उपलब्धता और मांग में अंतर को दर्शाता है।

हालांकि, शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी दर में कमी का मतलब यह नहीं है कि अधिक नौकरियां पैदा हुई हैं। इसका एक कारण यह भी है कि इस तिमाही में कम लोगों ने नौकरी की तलाश की। श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) – यानी काम करने वाले या नौकरी की तलाश करने वाले लोगों का अनुपात – समग्र रूप से 20 आधार अंकों की कमी के साथ 42.2% हो गया। शहरी क्षेत्रों में LFPR 30 आधार अंकों की कमी के साथ 39.7% पर आ गया, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह 10 आधार अंकों की कमी के साथ 43.1% रहा। यह गिरावट इंगित करती है कि सक्रिय रूप से काम की तलाश करने वाले लोगों की संख्या में कमी आई है।

कृषि से अन्य क्षेत्रों की ओर बदलाव

जनवरी-मार्च तिमाही में बेरोजगारी दर में वृद्धि और LFPR में गिरावट का एक कारण कृषि क्षेत्र से श्रमिकों का पलायन भी हो सकता है। आंकड़ों के अनुसार, कृषि श्रमिकों का हिस्सा अक्टूबर-दिसंबर तिमाही की तुलना में 2.1 प्रतिशत अंक घटकर 41.1% हो गया है। इसके विपरीत, खनन, विनिर्माण या निर्माण जैसे द्वितीयक क्षेत्र के श्रमिकों का हिस्सा 1.2 प्रतिशत अंक बढ़कर 25.2% हो गया है। सेवा क्षेत्र के श्रमिकों का हिस्सा भी 90 आधार अंकों की वृद्धि के साथ 33.7% पर पहुँच गया है। यह बदलाव श्रम बल की संरचना में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है, जहाँ श्रमिक अधिक संगठित और गैर-कृषि क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं।

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हालांकि, यह कहना मुश्किल है कि यह बदलाव केवल मौसमी है या दीर्घकालिक प्रवृत्ति का हिस्सा है। भारत में कृषि कार्य अक्सर मौसमी होते हैं, और कुछ तिमाहियों में कृषि से बाहर श्रमिकों की आवाजाही आम बात है। PLFS डेटा की नई श्रृंखला के कारण, पिछले वर्षों के मौसमी पैटर्न से तुलना करना अभी संभव नहीं है, जिससे इन बदलावों की प्रकृति को समझना थोड़ा चुनौतीपूर्ण हो जाता है। फिर भी, यह संकेत देता है कि अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं

रोजगार की गुणवत्ता में सुधार

कृषि क्षेत्र में श्रमिकों के हिस्से में कमी का एक सकारात्मक प्रभाव रोजगार की गुणवत्ता पर भी देखा गया है। अवैतनिक पारिवारिक श्रमिकों (स्व-नियोजित श्रमिकों का एक प्रकार) का हिस्सा 60 आधार अंकों की कमी के साथ 14.3% हो गया है। यह कमी दर्शाती है कि लोग अब ऐसे रोजगारों की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ उन्हें नियमित वेतन या मजदूरी मिलती है। इसी अवधि में, नियमित वेतन/वेतनभोगी श्रमिकों का हिस्सा 60 आधार अंकों की वृद्धि के साथ 25.5% पर पहुँच गया है। यह स्पष्ट सुधार दर्शाता है कि श्रम बाजार में अधिक स्थिर और औपचारिक रोजगार के अवसर पैदा हो रहे हैं

दूसरी ओर, आकस्मिक श्रमिकों का हिस्सा 20 आधार अंकों की कमी के साथ घटा है, जबकि स्वयं के खाते पर काम करने वाले स्व-नियोजित श्रमिकों का हिस्सा 20 आधार अंकों की वृद्धि के साथ बढ़ा है। यह बदलाव इंगित करता है कि जहाँ एक ओर अनौपचारिक और आकस्मिक रोजगार में कमी आई है, वहीं दूसरी ओर उद्यमिता और स्वरोजगार के अवसरों में वृद्धि हुई है। कुल मिलाकर, ये आंकड़े श्रम बाजार में एक सकारात्मक परिवर्तन का संकेत देते हैं, जहाँ श्रमिकों को बेहतर गुणवत्ता वाले और अधिक संरचित रोजगार के विकल्प मिल रहे हैं

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