छत्तीसगढ़ में LPG संकट: गैस की कमी से घरों से लेकर उद्योग तक प्रभावित, सियासत भी गरमाई
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छत्तीसगढ़ में इन दिनों एलपीजी (LPG) गैस की भारी किल्लत ने आम जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। रसोई से लेकर होटल, ढाबों और उद्योगों तक इसका असर साफ दिखाई दे रहा है। इस संकट ने जहां लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को मुश्किल बना दिया है, वहीं राजनीतिक माहौल भी गर्म हो गया है और आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है।
दरअसल, यह संकट पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और वहां से होने वाली पेट्रोलियम सप्लाई में बाधा के कारण पैदा हुआ है। इसका सीधा असर भारत के गैस आपूर्ति तंत्र पर पड़ा है, जिससे छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में एलपीजी सिलेंडर की उपलब्धता गंभीर रूप से प्रभावित हुई है।
घर-घर में बढ़ी परेशानी
राज्य के लाखों उपभोक्ता इस संकट से जूझ रहे हैं। पहले जहां गैस सिलेंडर एक-दो दिन में मिल जाता था, अब लोगों को हफ्तों इंतजार करना पड़ रहा है। कई जगह तो सिलेंडर मिल ही नहीं पा रहे हैं। इसके चलते आम लोग मजबूरी में लकड़ी, कोयला और पारंपरिक चूल्हों की ओर लौट रहे हैं।
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन लेने वाले परिवारों के लिए यह स्थिति और भी कठिन हो गई है, क्योंकि वे पूरी तरह गैस पर निर्भर थे। अब उन्हें फिर से पुराने तरीकों का सहारा लेना पड़ रहा है, जिससे स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों पर असर पड़ सकता है।
होटल और व्यवसाय पर बड़ा असर
एलपीजी की कमी का सबसे ज्यादा असर होटल, रेस्टोरेंट और छोटे व्यवसायों पर पड़ा है। कई शहरों में आधे से ज्यादा होटल-ढाबों को या तो बंद करना पड़ा है या फिर सीमित रूप से काम करना पड़ रहा है।
छोटे दुकानदार और चाय स्टॉल संचालक भी इस संकट से परेशान हैं। इंडक्शन चूल्हों की मांग अचानक बढ़ गई है, लेकिन हर व्यवसाय के लिए यह विकल्प व्यावहारिक नहीं है। ऐसे में कई लोग मजबूरी में कोयले और लकड़ी का उपयोग कर रहे हैं।
विधानसभा में हंगामा
इस मुद्दे ने राजनीतिक रूप भी ले लिया है। छत्तीसगढ़ विधानसभा में विपक्ष ने गैस संकट को लेकर जोरदार हंगामा किया। विपक्ष के नेताओं ने सरकार पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा कि समय रहते तैयारी नहीं की गई, जिससे यह स्थिति पैदा हुई।
विपक्ष ने गैस की कालाबाजारी और जमाखोरी पर रोक लगाने की मांग की और इस पर विस्तृत चर्चा कराने की भी कोशिश की, लेकिन मामला टकराव में बदल गया।
सोशल मीडिया पर भी जंग
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस मुद्दे को सोशल मीडिया पर जोर-शोर से उठाया। उन्होंने सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि जनता को राहत देने के बजाय सरकार स्थिति संभालने में विफल रही है।
वहीं मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह एक वैश्विक समस्या है और राज्य सरकार हालात को नियंत्रित करने के लिए लगातार प्रयास कर रही है।
उद्योगों पर भी संकट
गैस की कमी का असर केवल घरेलू उपयोग तक सीमित नहीं है। राज्य के औद्योगिक क्षेत्र, खासकर स्टील और मिनरल सेक्टर भी इससे प्रभावित हो रहे हैं।
उद्योग संगठनों का कहना है कि गैस की कमी के साथ-साथ कोयले की कीमतों में बढ़ोतरी और आयात में बाधा के कारण उत्पादन लागत बढ़ रही है, जिससे आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।
सरकार के कदम
राज्य सरकार ने स्थिति को संभालने के लिए कई कदम उठाने का दावा किया है। इनमें गैस वितरण को नियंत्रित करना, कालाबाजारी के खिलाफ कार्रवाई, और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की तलाश शामिल है।
हालांकि, विपक्ष का आरोप है कि ये कदम देर से उठाए गए और अभी भी पर्याप्त नहीं हैं।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थिति सामान्य नहीं होती, तब तक एलपीजी संकट पूरी तरह खत्म होना मुश्किल है। ऐसे में राज्य सरकार और केंद्र सरकार दोनों को मिलकर दीर्घकालिक समाधान निकालने की जरूरत है।
फिलहाल, छत्तीसगढ़ में गैस संकट सिर्फ एक आपूर्ति समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार इस चुनौती से कैसे निपटती है और आम जनता को राहत कब तक मिलती है।
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