छत्तीसगढ़ 7 मिनट पढ़ें

105 वर्षीय बांके बिहारी मंदिर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की धूम: 5 किलो लड्डू भोग

इस खबर की वेब स्टोरी देखें
1 व्यूज़

देशभर में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की भव्य धूम के बीच, छत्तीसगढ़ के धमतरी शहर में भी आस्था और उत्साह का अद्भुत संगम देखने को मिला। 105 वर्ष पुराने और अत्यंत प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व बड़े ही धूमधाम और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। इस अवसर पर सुबह से ही भक्तों की लंबी कतारें मंदिर परिसर में उमड़ पड़ीं, जो भगवान कृष्ण कन्हैया के दर्शन और उनकी कृपा पाने के लिए आतुर थे। मंदिर को विशेष रूप से सजाया गया था और विभिन्न पूजा-पाठ तथा विधानों के माध्यम से भगवान के जन्मोत्सव की तैयारियां की जा रही थीं। इस वर्ष जन्माष्टमी को और भी खास बनाने के लिए भगवान कृष्ण को 5 किलो का विशाल मोतीचूर का लड्डू भोग के रूप में चढ़ाया गया, जिसने भक्तों के बीच आकर्षण का केंद्र बना दिया। यह आयोजन न केवल धार्मिक उत्साह से भरा था, बल्कि इसने धमतरी की सांस्कृतिक विरासत को भी जीवंत कर दिया।

भक्तिमय माहौल और भक्तों का सैलाब

धमतरी के बांके बिहारी मंदिर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर अद्भुत भक्तिमय माहौल देखने को मिला। सुबह की पहली किरण फूटते ही, श्रद्धालु मंदिर की ओर उमड़ पड़े। भगवान नंदलाल के दर्शन के लिए भक्तों की भीड़ इतनी अधिक थी कि मंदिर परिसर और आसपास का क्षेत्र जयकारों और भजनों से गूंज उठा। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी अपनी-अपनी श्रद्धा और आस्था के साथ इस पावन पर्व का हिस्सा बनने पहुंचे थे। कई श्रद्धालु व्रत रखकर भगवान के जन्म की प्रतीक्षा कर रहे थे, जबकि अन्य लोग परिवार सहित उत्सव में शामिल होने आए थे। मंदिर के मुख्य द्वार से लेकर गर्भगृह तक लंबी-लंबी कतारें लगी थीं। रंग-बिरंगी रोशनी और फूलों से सजे मंदिर का नजारा अत्यंत मनमोहक था।

विशेष अनुष्ठान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन

बांके बिहारी मंदिर के पुजारी ने बताया कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को श्रद्धालुओं के लिए स्मृतिपूर्ण और विशेष बनाने के उद्देश्य से दिनभर विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। सुबह से ही भगवान कृष्ण की विशेष पूजा-अर्चना और अभिषेक का क्रम शुरू हो गया था, जिसमें दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से भगवान का स्नान कराया गया। इसके बाद उन्हें नवीन वस्त्र पहनाकर अलंकृत किया गया। दिनभर भजन-कीर्तन का दौर चलता रहा, जिसमें स्थानीय भजन मंडलियों ने अपनी मधुर प्रस्तुतियां दीं, जिससे वातावरण पूरी तरह से कृष्णमय हो गया। इसके अतिरिक्त, मंदिर परिसर में यज्ञ और हवन का भी आयोजन किया गया, जिसमें भक्तों ने आहुतियां देकर पुण्य लाभ कमाया। बच्चों और उनके परिजनों के लिए खास तौर पर 'दीप सजाओ' और 'राधा-कृष्ण सज्जा' जैसी प्रतियोगिताएं भी आयोजित की गईं, जिनमें उत्साहपूर्वक भाग लिया गया।

मध्यरात्रि जन्मोत्सव और अलौकिक दर्शन

जन्माष्टमी का सबसे प्रतीक्षित क्षण मध्यरात्रि में आया, जब तिथि के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया गया। रात 12 बजे जैसे ही घड़ी की सुइयां मिलीं, मंदिर परिसर 'हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की' के जयघोष से गूंज उठा। इस क्षण का इंतजार कर रहे हजारों भक्तों की आंखें भाव-विभोर हो गईं। भगवान कृष्ण के प्राकट्य के साथ ही शंखनाद हुआ, घंटियां बजीं और आरती उतारी गई। पूरा वातावरण भक्ति और आनंद से सराबोर हो गया। जन्मोत्सव के बाद, श्रद्धालुओं के लिए भगवान के विशेष दर्शन की व्यवस्था की गई थी। इस समय भगवान कृष्ण को पालने में झुलाया गया और भक्तों ने पालने को झूलाकर अपने आराध्य के प्रति प्रेम और श्रद्धा अर्पित की। यह क्षण भक्तों के लिए अत्यंत अलौकिक और अविस्मरणीय था, जिसे वे वर्षों तक संजो कर रखेंगे। मंदिर के पुजारी ने बताया कि जन्मोत्सव के बाद भक्तों में प्रसाद वितरण किया गया, जिसमें 5 किलो का विशेष मोतीचूर का लड्डू भी शामिल था, जिसे भगवान को भोग लगाया गया था। यह आयोजन धमतरी के लोगों के लिए केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी बन गया।

उत्पाद लोड हो रहे हैं…

धमतरी की धार्मिक पहचान में बांके बिहारी मंदिर का योगदान

धमतरी का बांके बिहारी मंदिर सिर्फ एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि शहर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। 105 वर्षों से अधिक पुराना यह मंदिर पीढ़ियों से आस्था का केंद्र रहा है। हर वर्ष जन्माष्टमी पर यहां होने वाला भव्य आयोजन इसकी महत्ता को बढ़ाता है। यह मंदिर स्थानीय और आसपास के क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए एक पवित्र तीर्थस्थल है, जो धमतरी की गहरी धार्मिक जड़ों और भक्ति परंपरा को दर्शाता है।

टैग्स

और पढ़ें

लेखक

आपकी प्रतिक्रिया