पांढुर्णा गोटमार मेला: 11 सितंबर को जाम नदी किनारे पत्थरों का खेल
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मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में स्थित पांढुर्णा में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला विश्व प्रसिद्ध गोटमार मेला इस बार भी पारंपरिक उत्साह के साथ 11 सितंबर को मनाया जाएगा। जाम नदी के किनारे, जहां यह सदियों पुरानी परंपरा निभाई जाती है, एक बार फिर पत्थरों का यह अनूठा खेल देखने को मिलेगा। यह मेला पांढुर्णा और सावरगांव के ग्रामीणों के बीच पत्थरों की बौछार के लिए जाना जाता है, जो एक प्राचीन लोक कथा और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, हालांकि इसमें सुरक्षा संबंधी चुनौतियां भी निहित हैं। प्रशासन ने इस आयोजन को शांतिपूर्ण और सुरक्षित ढंग से संपन्न कराने के लिए विस्तृत तैयारियां की हैं, ताकि परंपरा का निर्वहन हो सके और किसी भी अप्रिय घटना से बचा जा सके।
गोटमार मेले का इतिहास और महत्व
गोटमार मेले का इतिहास 300 साल से भी अधिक पुराना बताया जाता है, जिसकी जड़ें एक प्रेमकथा और बलिदान में निहित हैं। लोककथा के अनुसार, पांढुर्णा के एक युवक को सावरगांव की एक युवती से प्रेम हो गया था। जब युवक युवती को भगाकर अपने गांव ला रहा था, तो जाम नदी पार करते समय सावरगांव के लोगों ने उन्हें घेर लिया। इस दौरान, पांढुर्णा के लोगों ने अपने युवक और युवती को बचाने के लिए पत्थरों से हमला किया, जबकि सावरगांव के लोग भी उन्हें रोकने के लिए पत्थर फेंकने लगे। इसी संघर्ष में युवक-युवती की मृत्यु हो गई। उनकी याद में, और दोनों गांवों के बीच सौहार्दपूर्ण प्रतिद्वंद्विता को दर्शाने के लिए, हर साल भाद्रपद मास की अमावस्या के दूसरे दिन, जिसे पोला के नाम से भी जाना जाता है, यह गोटमार मेला आयोजित किया जाता है। नदी के बीच में एक पेड़ की शाखा पर झंडा लगाया जाता है, जिसे दोनों ओर के ग्रामीण पत्थरों की बौछार के बीच उतारने का प्रयास करते हैं। यह केवल एक खेल नहीं, बल्कि स्थानीय संस्कृति और पहचान का एक अभिन्न अंग है।
परंपरा और विवाद: सुरक्षा के उपाय
गोटमार मेला अपनी अनूठी परंपरा के लिए जितना प्रसिद्ध है, उतना ही यह अपने विवादित स्वरूप के कारण भी चर्चा में रहता है। पत्थरों के इस खेल में हर साल सैकड़ों लोग घायल होते हैं, और कई बार जानलेवा घटनाएं भी हो चुकी हैं। पिछले वर्षों में, दर्जनों लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं, और कुछ मामलों में मौतें भी दर्ज की गई हैं, जिससे इस परंपरा की सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। हालांकि, स्थानीय लोग इसे अपनी आस्था और पूर्वजों की स्मृति से जुड़ा मानते हुए इसका परित्याग करने को तैयार नहीं हैं। इसी को देखते हुए, प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक उपाय किए हैं। नदी के किनारे सुरक्षा जाली लगाने, पुलिस बल की भारी तैनाती, ड्रोन कैमरों से निगरानी और त्वरित चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने जैसे कदम उठाए जाते हैं। दोनों गांवों के प्रमुखों और बुजुर्गों के साथ बैठकें कर शांति बनाए रखने की अपील की जाती है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि परंपरा का निर्वहन बिना किसी बड़ी क्षति के हो सके।
प्रशासन की तैयारी और अपील
इस वर्ष भी 11 सितंबर को होने वाले गोटमार मेले के लिए जिला प्रशासन पूरी तरह से मुस्तैद है। छिंदवाड़ा जिले के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक ने स्वयं तैयारियों का जायजा लिया है। मेले स्थल पर धारा 144 लागू की जाएगी, ताकि भीड़ को नियंत्रित किया जा सके और किसी भी प्रकार के उपद्रव को रोका जा सके। पत्थर फेंकने वाले क्षेत्रों को चिह्नित कर वहां अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किया जाएगा, जिसमें राज्य पुलिस बल और होमगार्ड के जवान शामिल होंगे। नदी के दोनों किनारों पर करीब 200 से अधिक पुलिसकर्मियों की तैनाती की जाएगी। इसके अतिरिक्त, कई एम्बुलेंस और मेडिकल टीमें मौके पर मौजूद रहेंगी, जो घायलों को तत्काल उपचार प्रदान कर सकें। अस्पतालों में विशेष वार्ड भी तैयार किए जा रहे हैं। प्रशासन ने स्थानीय जनता और मेले में शामिल होने वाले लोगों से संयम बरतने और शांति बनाए रखने की अपील की है, ताकि यह ऐतिहासिक मेला सुरक्षित और सुचारू रूप से संपन्न हो सके।
स्थानीय संस्कृति और भविष्य की उम्मीदें
गोटमार मेला पांढुर्णा की पहचान का एक अविभाज्य हिस्सा है। यह सिर्फ पत्थरों का खेल नहीं, बल्कि सामुदायिक एकता, बहादुरी और पूर्वजों के प्रति सम्मान का प्रतीक है। हालांकि, आधुनिक समय में सुरक्षा चिंताओं के कारण इस परंपरा के स्वरूप को बदलने की मांगें भी उठती रही हैं। स्थानीय बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता इस बात पर विचार कर रहे हैं कि कैसे इस परंपरा को सुरक्षित तरीके से जारी रखा जा सके, शायद पत्थरों के आकार को सीमित करके या वैकल्पिक सामग्री का उपयोग करके, या फिर नियमों को और सख्त बनाकर। कुछ लोग मेले को केवल सांकेतिक बनाने की वकालत करते हैं, जहां पारंपरिक रीति-रिवाज तो हों, लेकिन पत्थरबाजी का जोखिम कम हो। प्रशासन और समुदाय के बीच निरंतर संवाद और सहयोग ही इस मेले के सुरक्षित भविष्य की कुंजी है, ताकि यह अपनी सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखते हुए सभी के लिए सुरक्षित रह सके। इस वर्ष भी, सबकी निगाहें 11 सितंबर पर होंगी कि कैसे यह प्राचीन परंपरा आधुनिक सुरक्षा चुनौतियों के बीच अपना अस्तित्व बनाए रखती है।
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