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छत्तीसगढ़ की पहचान नाचा-गम्मत: समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर संकट के बादल

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छत्तीसगढ़ की पहचान नाचा-गम्मत: समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर संकट के बादल
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भारत के हृदयस्थल, छत्तीसगढ़, की एक अनमोल सांस्कृतिक धरोहर, नाचा-गम्मत, आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। यह पारंपरिक लोकनाट्य शैली, जो दशकों से ग्रामीण जीवन का अभिन्न अंग रही है, आधुनिकता की दौड़ में अपनी चमक खोती जा रही है। कभी गाँव-गाँव में मनोरंजन और सामाजिक चेतना का प्रमुख साधन रही यह कला, अब दर्शकों और कलाकारों दोनों की कमी से जूझ रही है। छत्तीसगढ़ की माटी से जन्मी यह कला, जिसमें नृत्य (नाचा) और हास्य-व्यंग्य (गम्मत) का अद्भुत संगम होता है, तेजी से विलुप्ति की ओर बढ़ रही है, जिसके पीछे सरकारी उपेक्षा, कलाकारों की आर्थिक बदहाली और आधुनिक मनोरंजन के साधनों का बढ़ता प्रभाव जैसे कई कारण जिम्मेदार हैं। यह केवल एक कला का अंत नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक पहचान का लुप्त होना है।

नाचा-गम्मत क्या है? एक जीवंत कला का परिचय

नाचा-गम्मत छत्तीसगढ़ की एक अनूठी लोकनाट्य शैली है जो नृत्य, संगीत, संवाद और हास्य का मिश्रण है। 'नाचा' का अर्थ नृत्य से है, जबकि 'गम्मत' का अर्थ हास्य या प्रहसन से है। यह कला रूप मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में विकसित हुआ, जहाँ यह ग्रामीणों के मनोरंजन और सामाजिक संदेशों के प्रचार-प्रसार का एक सशक्त माध्यम था। नाचा-गम्मत में आमतौर पर पुरुष कलाकार ही महिला पात्रों की भूमिका निभाते हैं, जिन्हें 'सिंगारी' कहा जाता है। इन कलाकारों की वेशभूषा, मेकअप और अभिनय कौशल दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है। प्रदर्शनों में अक्सर सामाजिक कुरीतियों, पौराणिक कथाओं, ऐतिहासिक घटनाओं और दैनिक जीवन की समस्याओं पर आधारित कहानियाँ प्रस्तुत की जाती हैं, जिन्हें व्यंग्यात्मक और मनोरंजक ढंग से दर्शाया जाता है। इसमें ढोलक, मंजीरा, तबला, हारमोनियम और कभी-कभी बैंजो जैसे वाद्य यंत्रों का प्रयोग होता है, जो प्रदर्शन में एक जीवंत ऊर्जा भर देते हैं। यह कला पारंपरिक रूप से खुले मंचों या चौपालों पर प्रस्तुत की जाती थी, जहाँ गाँव के सभी लोग एक साथ बैठकर इसका आनंद लेते थे।

सांस्कृतिक महत्व और पहचान का प्रतीक

नाचा-गम्मत केवल एक मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतिबिंब है। यह कला पीढ़ियों से मौखिक परंपरा के माध्यम से हस्तांतरित होती रही है, और इसने छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह सामाजिक मुद्दों पर विचार-विमर्श करने, नैतिकता सिखाने और सामूहिक चेतना जगाने का एक प्रभावी मंच रहा है। त्योहारों, मेलों और विशेष आयोजनों पर नाचा-गम्मत का प्रदर्शन अनिवार्य माना जाता था, और यह ग्रामीण समुदायों को एकजुट करने का एक महत्वपूर्ण तरीका भी था। कलाकारों की वेशभूषा, उनके गीत और नृत्य की शैलियाँ छत्तीसगढ़ की भौगोलिक और सामाजिक विविधता को दर्शाती हैं। यह कला स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी देशभक्ति और सामाजिक सुधार के संदेश फैलाने में सहायक रही है। नाचा-गम्मत ने छत्तीसगढ़ी भाषा और लोक साहित्य के संरक्षण में भी योगदान दिया है, क्योंकि इसके संवाद और गीत अक्सर स्थानीय मुहावरों और लोक कथाओं पर आधारित होते हैं।

विलुप्ति की कगार पर: कारण और चुनौतियाँ

नाचा-गम्मत के विलुप्ति के कगार पर पहुँचने के कई जटिल कारण हैं। सबसे प्रमुख कारण आधुनिक मनोरंजन के साधनों जैसे टेलीविजन, इंटरनेट और मोबाइल फोन का बढ़ता प्रभाव है। युवा पीढ़ी अब पारंपरिक कला रूपों में रुचि नहीं ले रही है, और उनका ध्यान पश्चिमी संस्कृति एवं डिजिटल सामग्री की ओर अधिक आकर्षित हो रहा है। सरकारी संरक्षण का अभाव भी एक बड़ी चुनौती है। पर्याप्त वित्तीय सहायता, प्रदर्शन के अवसर और कलाकारों के लिए सम्मानजनक मानदेय की कमी ने इस कला से जुड़े लोगों को हताश किया है। कई कलाकार गरीबी और उपेक्षा के कारण इस पेशे को छोड़ने पर मजबूर हो रहे हैं। प्रशिक्षण संस्थानों और गुरु-शिष्य परंपरा का कमजोर पड़ना भी नए कलाकारों को इस क्षेत्र में आने से रोक रहा है। इसके अलावा, कलाकारों को मिलने वाला सामाजिक सम्मान कम हुआ है, जिससे अगली पीढ़ी इस कला को अपनाने से कतरा रही है। पिछले दो दशकों में कई अनुभवी कलाकार दुनिया छोड़ गए हैं, और उनकी जगह लेने वाले नए कलाकार कम ही हैं।

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संरक्षण के प्रयास और भविष्य की राह

नाचा-गम्मत जैसी अमूल्य सांस्कृतिक विरासत को बचाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इसके संरक्षण के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना होगा। सबसे पहले, राज्य सरकार को विशेष योजनाएँ बनानी चाहिए, जिसमें कलाकारों को नियमित मानदेय, स्वास्थ्य सुविधाएँ और सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जाए। नाचा-गम्मत के प्रदर्शन के लिए अधिक मंच और अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए, खासकर शहरी क्षेत्रों और पर्यटन स्थलों पर, ताकि इसे व्यापक दर्शक वर्ग मिल सके। प्रशिक्षण केंद्र और अकादमियाँ स्थापित की जानी चाहिए, जहाँ युवा पीढ़ी को इस कला का विधिवत प्रशिक्षण दिया जा सके। पाठ्यक्रमों में नाचा-गम्मत को शामिल करना भी एक अच्छा कदम हो सकता है, जिससे बच्चे अपनी संस्कृति से जुड़ सकें। डिजिटल माध्यमों का उपयोग कर नाचा-गम्मत का प्रचार-प्रसार किया जा सकता है, जैसे ऑनलाइन प्रदर्शन, वृत्तचित्र और सोशल मीडिया अभियान। स्थानीय समुदायों और गैर-सरकारी संगठनों को भी इस कला के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, जागरूकता अभियान चलाकर और कार्यक्रमों का आयोजन कर। यह केवल कला का संरक्षण नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की पहचान और उसकी आत्मा को जीवित रखने का प्रयास है।

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