RTE एडमिशन पर बवाल: निजी स्कूलों ने किया बंद का ऐलान, अभिभावकों में चिंता
देशभर में शिक्षा के अधिकार कानून यानी Right to Education Act (RTE) के तहत होने वाले एडमिशन को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। कई राज्यों में निजी स्कूलों ने सरकार की नीतियों और भुगतान संबंधी मुद्दों के विरोध में बंद का ऐलान कर दिया है। इस फैसले से लाखों छात्रों और अभिभावकों के सामने अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो गई है।
क्या है पूरा मामला?
RTE के तहत निजी स्कूलों को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और वंचित समूहों के बच्चों के लिए 25% सीटें आरक्षित करनी होती हैं। सरकार इन छात्रों की फीस का भुगतान करती है। लेकिन स्कूल प्रबंधन का आरोप है कि सरकार की ओर से फीस प्रतिपूर्ति (reimbursement) में लगातार देरी हो रही है, जिससे स्कूलों पर आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा है।
निजी स्कूल संघों का कहना है कि कई वर्षों का बकाया भुगतान अभी तक नहीं मिला है। ऐसे में स्कूलों का संचालन करना मुश्किल हो रहा है। इसी कारण उन्होंने विरोध स्वरूप स्कूल बंद करने का निर्णय लिया है।
स्कूल प्रबंधन की क्या मांगें हैं?
निजी स्कूल संचालकों ने सरकार के सामने कई प्रमुख मांगें रखी हैं:।
- लंबित फीस प्रतिपूर्ति का जल्द भुगतान
- RTE के तहत तय राशि में बढ़ोतरी
- एडमिशन प्रक्रिया में पारदर्शिता
- नियमों में बार-बार बदलाव पर रोक
स्कूल प्रबंधन का कहना है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द सुनवाई नहीं होती है, तो विरोध और तेज किया जाएगा।
अभिभावकों की बढ़ी परेशानी
निजी स्कूलों के बंद के ऐलान से सबसे ज्यादा परेशानी अभिभावकों और बच्चों को हो रही है। जिन बच्चों का एडमिशन RTE के तहत होना था, उनका भविष्य अधर में लटक गया है। कई अभिभावक इस बात को लेकर चिंतित हैं कि अगर स्कूल बंद रहे तो उनके बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ेगा।
अभिभावकों का कहना है कि सरकार और स्कूल प्रबंधन को मिलकर इस मुद्दे का समाधान निकालना चाहिए ताकि बच्चों की शिक्षा प्रभावित न हो।
सरकार का क्या कहना है?
सरकार की ओर से कहा गया है कि RTE के तहत भुगतान की प्रक्रिया जारी है और जल्द ही बकाया राशि जारी कर दी जाएगी। अधिकारियों का दावा है कि तकनीकी कारणों और दस्तावेजों की जांच के चलते देरी हो रही है, लेकिन इसे प्राथमिकता के आधार पर निपटाया जा रहा है।
सरकार ने निजी स्कूलों से अपील की है कि वे बच्चों की पढ़ाई को ध्यान में रखते हुए स्कूल बंद करने जैसे कदम न उठाएं।
शिक्षा व्यवस्था पर पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह विवाद लंबा चलता है, तो इसका असर पूरी शिक्षा व्यवस्था पर पड़ सकता है। RTE कानून का मुख्य उद्देश्य सभी बच्चों को समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है। ऐसे में इस तरह के विवाद से उस उद्देश्य को नुकसान पहुंच सकता है।
समाधान की जरूरत
इस पूरे मामले में सबसे जरूरी है कि सरकार और निजी स्कूल प्रबंधन के बीच संवाद स्थापित हो। दोनों पक्षों को मिलकर ऐसा समाधान निकालना होगा जिससे न तो स्कूलों पर आर्थिक बोझ बढ़े और न ही बच्चों की शिक्षा प्रभावित हो।
और पढ़ें
- छत्तीसगढ़ न्यूज़
- ताज़ा खबरें
- महासमुंद में सुरों का महाकुंभ: 'गाइये और छा जाइये' मंच पर युवाओं का उत्साह, विधायक अनुज शर्मा ने बढ़ाया हौसला
- दुर्ग-भिलाई-राजनांदगांव: निगमों में नए नियम, टैक्स राहत, स्वास्थ्य चुनौतियाँ
- भारतमाला घोटाला: ED ने ₹9.83 करोड़ के मुख्य आरोपी को दबोचा
- सीएम साय ने 22 मेधावी श्रमिक छात्रों को दिए 2-2 लाख, शिक्षा पर जोर