देश 7 मिनट पढ़ें

9 राज्यों में 42 हजार बुजुर्गों का नेटवर्क: आत्मनिर्भरता की नई मिसाल

23 व्यूज़
9 राज्यों में 42 हजार बुजुर्गों का नेटवर्क: आत्मनिर्भरता की नई मिसाल
देश

भारत के 9 राज्यों में फैले करीब 42 हजार बुजुर्ग अब सिर्फ अपने परिवारों पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे के सहारे और सामूहिक प्रयासों से आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश कर रहे हैं। हेल्पएज इंडिया द्वारा 2004 की विनाशकारी सुनामी के बाद तमिलनाडु में शुरू किए गए इन एल्डर सेल्फ-हेल्प ग्रुप्स (बुजुर्ग स्वयं सहायता समूहों) ने आज 3 हजार से अधिक समूहों का एक विशाल नेटवर्क तैयार कर लिया है। इन समूहों में शामिल 70% बुजुर्ग न केवल अपनी आर्थिक और सामाजिक जरूरतों को पूरा कर रहे हैं, बल्कि आपात स्थितियों में भी एक-दूसरे का सहारा बन रहे हैं। बिहार के सुपौल जिले के 75 वर्षीय मोहन मंडल का उदाहरण इस पहल की सफलता को बखूबी दर्शाता है, जिन्हें ब्रेन स्ट्रोक के बाद अपने समूह की मदद से जीवनदान मिला। यह मॉडल भारत में बुजुर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा और गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

'लखपति' बुजुर्गों की कहानी: सुपौल का प्रेरक मॉडल

बिहार के सुपौल जिले में रहने वाले 75 वर्षीय मोहन मंडल उन हजारों बुजुर्गों में से एक हैं जिनकी जिंदगी इन स्वयं सहायता समूहों से जुड़ने के बाद पूरी तरह बदल गई। एक दिन अचानक आए ब्रेन स्ट्रोक ने उनके परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया, जब इलाज का खर्च लाखों में पहुंच गया। ऐसे कठिन समय में उनके गांव के बुजुर्गों के समूह ने परिवार का मार्गदर्शन किया और उन्हें सरकारी योजना से सूचीबद्ध अस्पताल तक पहुंचाया। समूह के एक साथी की प्रेरणा से मोहन मंडल ने पहले ही ‘वय वंदना कार्ड’ बनवा लिया था, जिसने उनकी जिंदगी बचाई। इस कार्ड की मदद से उनका 3 लाख रुपए का ऑपरेशन संभव हो सका और आज वह पूरी तरह स्वस्थ हैं।

सुपौल के इन बुजुर्गों का समूह सिर्फ आपातकालीन मदद तक ही सीमित नहीं है। वे हर महीने 50-50 रुपए की छोटी बचत करते हैं, जिसने 15 सालों में एक बड़ा कोष बना लिया है। इस समूह ने अपने सदस्यों को अब तक 2.33 करोड़ रुपए का ऋण दिया है, जिससे उन्हें 13 लाख रुपए की आय भी हुई है। आज, इस समूह के प्रत्येक सदस्य की हिस्सेदारी 1.19 लाख रुपए हो गई है, जिसके चलते लोग उन्हें गर्व से 'लखपति बुजुर्ग' कहकर पुकारते हैं। यह वित्तीय सुरक्षा उन्हें न केवल बीमारियों से लड़ने में मदद करती है, बल्कि छोटे-मोटे व्यवसाय शुरू करने या अपने परिवार के लिए योगदान देने का अवसर भी प्रदान करती है।

सुनामी से आत्मनिर्भरता तक: एक नई पहल का उदय

बुजुर्गों के लिए यह अनूठी पहल 2004 में आई विनाशकारी सुनामी के बाद 2005 में चेन्नई में शुरू हुई थी। हेल्पएज इंडिया ने महसूस किया कि प्राकृतिक आपदाओं में बुजुर्ग सबसे अधिक प्रभावित होते हैं और उन्हें विशेष सहायता की आवश्यकता होती है। इसी सोच के साथ पहला एल्डर सेल्फ हेल्प ग्रुप बनाया गया, जिसका उद्देश्य बुजुर्गों को एक ऐसा मंच प्रदान करना था जहाँ वे एक-दूसरे का समर्थन कर सकें। इन समूहों में आमतौर पर 55 वर्ष या उससे अधिक उम्र के 10 से 20 बुजुर्ग सदस्य होते हैं। संस्था गांवों में जाकर ऐसे बुजुर्गों की पहचान करती है जो आर्थिक, सामाजिक या स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों का सामना कर रहे होते हैं।

उत्पाद लोड हो रहे हैं…

इन समूहों के सदस्य नियमित रूप से बैठक करते हैं, जहाँ वे न केवल अपनी बचत जमा करते हैं और एक-दूसरे को ऋण देते हैं, बल्कि स्थानीय समस्याओं पर भी मिलकर काम करते हैं। वे सरकारी योजनाओं तक पहुंच बनाने में भी एक-दूसरे की मदद करते हैं, जैसा कि मोहन मंडल के मामले में देखा गया। यह नियमित संपर्क और सामूहिक प्रयास बुजुर्गों को अकेलापन महसूस नहीं होने देता और उन्हें समाज का एक सक्रिय हिस्सा बनाए रखता है। गिरीश मिश्रा, मिशन हेड, लाइवलीहुड एंड रेजिलिएंस, हेल्पएज इंडिया के अनुसार, इन ग्रुप्स से जुड़े 70% बुजुर्ग अब पूरी तरह आत्मनिर्भर हो गए हैं, जो इस मॉडल की असाधारण सफलता को दर्शाता है।

सरकारी मान्यता और भविष्य की राह

इस एल्डर सेल्फ हेल्प ग्रुप मॉडल की सफलता को देखते हुए, भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय ने भी इसे अपनाने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। इस मॉडल को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन में शामिल किया गया है, जो इसकी व्यापकता और प्रभावशीलता की पुष्टि करता है। यह सरकारी समर्थन इन समूहों को और अधिक मजबूती प्रदान करेगा और देश के कोने-कोने तक इसकी पहुंच बढ़ाने में मदद करेगा। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत, यह मॉडल देश भर के लाखों अन्य बुजुर्गों तक पहुंचने की क्षमता रखता है, जिससे उन्हें सम्मानजनक और आत्मनिर्भर जीवन जीने का अवसर मिलेगा।

यह पहल दिखाती है कि कैसे समुदाय-आधारित दृष्टिकोण और आपसी सहयोग से बुजुर्गों की चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सकता है। यह न केवल उन्हें वित्तीय सुरक्षा प्रदान करता है, बल्कि उन्हें सामाजिक रूप से सक्रिय और मानसिक रूप से स्वस्थ रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जैसे-जैसे भारत में बुजुर्गों की आबादी बढ़ रही है, ऐसे मॉडल भविष्य के लिए एक मजबूत नींव तैयार करते हैं, जहाँ बुजुर्गों को बोझ नहीं, बल्कि समाज का एक मूल्यवान और आत्मनिर्भर हिस्सा माना जाए। यह पहल एक सशक्त और समावेशी समाज के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

टैग्स

और पढ़ें

लेखक